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भारत में बच्चों की सुरक्षा के लिए एआई साक्षरता की आवश्यकता: विशेषज्ञ की राय

विश्व आर्थिक मंच की एआई विशेषज्ञ कैथी ली ने भारत में शिक्षा प्रणाली में एआई साक्षरता को शामिल करने और बच्चों की सुरक्षा में निवेश करने की आवश्यकता पर जोर दिया है। उन्होंने बताया कि एआई से बच्चों के लिए नए अवसर पैदा हो रहे हैं, लेकिन इसके साथ ही कई जोखिम भी हैं। ली ने सुझाव दिया कि सुरक्षा उपायों को स्थानीय भाषाओं और सांस्कृतिक संदर्भों के अनुसार विकसित किया जाना चाहिए। उनका मानना है कि बच्चों को एआई के सुरक्षित उपयोग के लिए आवश्यक कौशल प्रदान करना महत्वपूर्ण है।
 

एआई साक्षरता और बच्चों की सुरक्षा पर जोर

(कोमल शर्मा) नयी दिल्ली, 11 अक्टूबर - विश्व आर्थिक मंच की एआई विशेषज्ञ कैथी ली ने भारत की शिक्षा प्रणाली में एआई साक्षरता को शामिल करने और बच्चों की सुरक्षा में निवेश करने वाली कंपनियों को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता पर बल दिया है। उन्होंने कहा कि एआई बच्चों के लिए शिक्षा, रचनात्मकता और संबंधी सुविधाओं के विस्तार के नए अवसर प्रदान कर रहा है, लेकिन इसके साथ ही हानिकारक सामग्री, निजता का उल्लंघन, भ्रामक जानकारी और शोषण जैसे जोखिम भी बढ़ रहे हैं।


ली ने एक साक्षात्कार में बताया कि भारत जैसे विविध देश में एआई सुरक्षा उपायों को स्थानीय भाषाओं, सांस्कृतिक संदर्भों, इंटरनेट की उपलब्धता और डिजिटल साक्षरता के विभिन्न स्तरों को ध्यान में रखते हुए विकसित किया जाना चाहिए।


‘एआई के दौर में बच्चों की सुरक्षा और बेहतरी: सर्वश्रेष्ठ व्यवहार तथा प्रोत्साहन’ पर जारी एक श्वेतपत्र की सह-लेखिका ली ने कहा कि बच्चों को यह समझना आवश्यक है कि एआई कहां गलत हो सकता है, जानकारी की पुष्टि कैसे करनी चाहिए और कब मानवीय निर्णय लेना जरूरी है।


उन्होंने सुझाव दिया कि एआई साक्षरता को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना चाहिए और बच्चों द्वारा उपयोग की जाने वाली एआई प्रणालियों में सुरक्षा और बाल अधिकारों से संबंधित आकलन अनिवार्य होना चाहिए।


ली ने कहा कि भारत में एआई मॉडल का परीक्षण विभिन्न भाषाओं और सांस्कृतिक संदर्भों में किया जाना चाहिए। इस प्रक्रिया में बच्चों, शिक्षकों, अभिभावकों और बाल सुरक्षा विशेषज्ञों की भागीदारी भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।


उन्होंने कहा कि सरकारी खरीद, वित्तपोषण और स्वतंत्र मूल्यांकन के माध्यम से कंपनियों को बच्चों की सुरक्षा में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। ली ने कहा, ‘‘सुरक्षा और नवोन्मेषण को एक-दूसरे के विरोधी लक्ष्यों के रूप में नहीं देखना चाहिए।


बच्चे एआई के साथ बड़े होंगे, और हमारा उद्देश्य उन्हें इसके सुरक्षित और प्रभावी उपयोग के लिए आवश्यक कौशल और संरक्षण प्रदान करना है।


उन्होंने यह भी कहा कि बच्चों की सुरक्षा के लिए कोई एक उपाय पर्याप्त नहीं है। सुरक्षा उपायों को बच्चों की उम्र, विकास के स्तर और संबंधित एआई प्रणाली की क्षमताओं के अनुसार होना चाहिए।


केवल उम्र की पुष्टि करने की व्यवस्था किसी प्रणाली को सुरक्षित नहीं बनाती। ली ने कहा कि एआई को बच्चों की सीखने की क्षमता और स्वतंत्र निर्णय लेने की योग्यता को बढ़ावा देना चाहिए, न कि शिक्षकों, अभिभावकों या मानवीय संबंधों का स्थान लेना चाहिए।


उन्होंने कहा कि निजता संबंधी सेटिंग, अभिभावकों का नियंत्रण और शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया सरल होनी चाहिए और सुरक्षा के मजबूत उपाय ‘डिफॉल्ट’ रूप से सक्रिय रहना चाहिए।


किसी बच्चे को केवल इसलिए कम सुरक्षा नहीं मिलनी चाहिए क्योंकि उसके माता-पिता के पास समय, संसाधन या डिजिटल जानकारी की कमी है। ली ने कहा कि भारत के पास अपने एआई पारिस्थितिकी तंत्र के विकास के साथ-साथ बच्चों की सुरक्षा के लिए स्थानीय स्तर पर मजबूत क्षमता विकसित करने का अवसर है।


इसके लिए भारतीय भाषाओं और परिस्थितियों के अनुरूप आंकड़ों, स्वतंत्र मूल्यांकन, शिकायत निवारण व्यवस्था और बाल अधिकारों पर प्रभाव के आकलन की आवश्यकता होगी।


उन्होंने कहा कि सरकार, उद्योग, विश्वविद्यालय और नागरिक समाज मिलकर साझा परीक्षण उपकरण, आंकड़े और विशेषज्ञता उपलब्ध करा सकते हैं, ताकि छोटे स्टार्टअप भी बच्चों की सुरक्षा के लिए प्रभावी व्यवस्था विकसित कर सकें।


ली ने कहा कि एआई के उपयोग से जुड़े नियमों में निजता, जवाबदेही, मानवीय निगरानी और शोषण से सुरक्षा के साझा मानक होने चाहिए, जबकि उनके क्रियान्वयन में भारत की भाषाई विविधता, शिक्षा प्रणाली और प्रौद्योगिकी के उपयोग के तरीकों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।


उन्होंने कहा, ‘‘सफलता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि बच्चों को एआई से दूर रखा गया है या नहीं। यह देखना अधिक महत्वपूर्ण है कि वे एआई का उपयोग करने के लिए कितने सुरक्षित और सक्षम हैं।