भारत से इराक को बासमती चावल का निर्यात: लागत में भारी कमी की उम्मीद
चावल निर्यात में नई पहल
भारतीय चावल निर्यातकों के संघ ने इराक को 1,02,210 टन बासमती चावल भेजने की योजना बनाई है, जिसमें तीन बड़े मालवाहक जहाज शामिल हैं। यह कदम पश्चिम एशिया में व्यापार को प्रभावित कर रही जहाजरानी संबंधी समस्याओं, कंटेनर की कमी और बढ़ती लॉजिस्टिक लागत के बीच उठाया गया है। इस पहल का उद्देश्य माल ढुलाई की लागत को 74 प्रतिशत तक कम करना है।
आईआरईएफ ने बताया कि सिंगापुर स्थित एक्सिमवाला सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड के सहयोग से इस व्यवस्था के तहत माल ढुलाई की लागत लगभग 350 डॉलर प्रति टन से घटकर 90 डॉलर प्रति टन होने की उम्मीद है। इससे प्रति टन लगभग 260 डॉलर की बचत हो सकती है। इस कार्यक्रम के तहत कुल 2.66 करोड़ डॉलर की बचत होने की संभावना है, हालांकि वास्तविक बचत अंतिम लागत और खेप भेजने की शर्तों पर निर्भर करेगी।
जहाजों की यात्रा और चावल की मात्रा
आईआरईएफ ने कहा कि तीनों जहाज इराक के उम्म कसर बंदरगाह पर पहुंचेंगे। इनमें से एक जहाज, एमवी लामार एस, पहले ही बंदरगाह पर पहुंच चुका है और चावल उतारने का कार्य शुरू हो गया है। अन्य दो जहाज, एमवी लोलो गेट और एमवी आउटलैंडर, क्रमशः 25,500 टन और 39,900 टन चावल लेकर जाएंगे। यह पहल ऐसे समय में की गई है जब निर्यातकों को खाड़ी देशों में माल ढुलाई की ऊंची दरों और लॉजिस्टिक संबंधी अनिश्चितताओं का सामना करना पड़ रहा है।
बासमती चावल का निर्यात आंकड़ा
आईआरईएफ के अनुसार, मार्च 2026 में समाप्त वित्त वर्ष के दौरान भारत ने पश्चिम एशिया को 45.64 लाख टन बासमती चावल का निर्यात किया, जिसका मूल्य 34,284 करोड़ रुपये था। यह भारत के कुल बासमती चावल निर्यात का लगभग 70 प्रतिशत है। यदि गैर-बासमती चावल को भी शामिल किया जाए, तो इस क्षेत्र को कुल 56.48 लाख टन चावल का निर्यात किया गया।
सऊदी अरब का प्रमुख बाजार
फेडरेशन ने बताया कि वित्त वर्ष 2025-26 में सऊदी अरब भारत के बासमती चावल का सबसे बड़ा बाजार रहा, जहां 8,324 करोड़ रुपये मूल्य का चावल निर्यात किया गया। इसके बाद ईरान, इराक और संयुक्त अरब अमीरात में क्रमशः 6,970 करोड़ रुपये, 5,583 करोड़ रुपये और 4,132 करोड़ रुपये मूल्य का बासमती चावल भेजा गया।
लॉजिस्टिक लागत में कमी का महत्व
आईआरईएफ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष देव गर्ग ने कहा कि पश्चिम एशिया भारत के बासमती चावल निर्यात में 70 प्रतिशत हिस्सेदारी रखता है, और जहाजरानी की बढ़ती लागत हमारी प्रतिस्पर्धात्मकता को प्रभावित करती है। उन्होंने कहा कि माल ढुलाई की लागत को 350 डॉलर से घटाकर 90 डॉलर प्रति टन करने का लक्ष्य दिखाता है कि बेहतर लॉजिस्टिक व्यवस्था से भारतीय निर्यातकों और विदेशी खरीदारों दोनों को लाभ हो सकता है।
भविष्य की संभावनाएं
यदि अन्य बाजारों में भी ऐसी व्यवस्था अपनाई जाती है, तो यह निर्यातकों को एक वैकल्पिक रास्ता प्रदान कर सकती है। इस पहल से मिलने वाला वास्तविक लाभ बड़े मालवाहक जहाजों की नियमित उपलब्धता, बंदरगाह पर माल चढ़ाने-उतारने की लागत, और खेप भेजने के कार्यक्रम पर निर्भर करेगा। यह पहल 23 से 25 अक्टूबर तक नई दिल्ली में आयोजित होने वाले भारत अंतरराष्ट्रीय चावल सम्मेलन (बीआईआरसी) 2026 से पहले की गई है।
सम्मेलन में चर्चा के विषय
सम्मेलन में 'जहाजरानी: बड़े जहाज एवं कंटेनर—लाभ मार्जिन बचाना और विवादों को कम करना' विषय पर एक विशेष सत्र होगा। इसमें माल ढुलाई की लागत, बड़े जहाजों और कंटेनर से परिवहन के बीच अंतर, माल बीमा, बंदरगाहों पर देरी, समुद्री परिवहन अनुबंध और विवादों की रोकथाम पर चर्चा की जाएगी।