भारतीय रुपये की स्थिति: 2025 में गिरावट और भविष्य की संभावनाएं
इस लेख में भारतीय रुपये की स्थिति का विश्लेषण किया गया है, जिसमें 2025 में रुपये की गिरावट के कारणों और इसके प्रभावों पर चर्चा की गई है। जानें कि कैसे विदेशी निवेशकों की निकासी और अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता में अनिश्चितता ने रुपये को प्रभावित किया है। विशेषज्ञों की राय के अनुसार, भविष्य में रुपये की स्थिति क्या हो सकती है और निर्यातकों के लिए इसका क्या अर्थ है।
Jan 1, 2026, 22:32 IST
भारतीय रुपये की चाल और गिरावट
इस वर्ष के अंत में भारतीय रुपये की स्थिति कुछ सकारात्मक संकेत नहीं दे रही है। 2025 रुपये के लिए एक चुनौतीपूर्ण वर्ष साबित हुआ है। डॉलर के मुकाबले, रुपये ने साल के अंतिम कारोबारी दिन 89.87 पर बंद किया, जो कि सालाना आधार पर 4.72 प्रतिशत की गिरावट को दर्शाता है। यह गिरावट पिछले तीन वर्षों में सबसे अधिक मानी जा रही है।
रुपये की गिरावट के कारण
इस साल रुपये कई बार अपने ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंचा और एक समय 91 के पार भी चला गया, जिससे बाजार में स्पष्ट दबाव देखा गया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह गिरावट मुख्य रूप से विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली और अमेरिका के साथ व्यापार समझौते में अनिश्चितता के कारण हुई है।
विदेशी निवेशकों की निकासी
वर्तमान जानकारी के अनुसार, वित्त वर्ष 2025 में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से लगभग 18 अरब डॉलर की निकासी की है, जबकि कर्ज और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भी कमजोर रहे। इसके परिणामस्वरूप, भारत का चालू खाता संतुलन अप्रैल से नवंबर के बीच लगभग 22 अरब डॉलर के घाटे में चला गया, जो अब तक के सबसे ऊंचे स्तरों में से एक है।
रुपये पर दबाव के कारण
आईडीएफसी फर्स्ट बैंक की अर्थशास्त्री गौरा सेन गुप्ता के अनुसार, रुपये पर दबाव का मुख्य कारण पूंजी प्रवाह में कमी है। उन्होंने बताया कि रिजर्व बैंक ने विनिमय दर को लेकर अधिक लचीला रुख अपनाया है और बाजार को स्वाभाविक दिशा में चलने दिया जा रहा है।
अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति
2022 में रुपये की गिरावट अमेरिकी फेडरल रिजर्व की सख्त मौद्रिक नीति से जुड़ी थी, जबकि 2025 में स्थिति भिन्न रही। इस वर्ष अमेरिकी डॉलर इंडेक्स लगभग 9.5 प्रतिशत कमजोर हुआ, फिर भी रुपये ने एशियाई मुद्राओं की तुलना में कमजोर प्रदर्शन किया।
भविष्य की संभावनाएं
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता में देरी ने निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया है। यदि यह समझौता होता है, तो रुपये अस्थायी रूप से 88.50 तक मजबूत हो सकता है, लेकिन इसके बाद फिर से दबाव लौटने की संभावना बनी रहेगी।
आरबीआई का नया रुख
रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा के कार्यभार संभालने के बाद, केंद्रीय बैंक का दृष्टिकोण भी बदल गया है। अब आरबीआई अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोकने के लिए सीमित हस्तक्षेप कर रहा है, न कि किसी निश्चित स्तर को बनाए रखने पर जोर दे रहा है।
वास्तविक प्रभावी विनिमय दर
केंद्रीय बैंक के आंकड़ों के अनुसार, भारत का 40-मुद्रा व्यापार भारित वास्तविक प्रभावी विनिमय दर नवंबर में घटकर 97.5 रह गया, जो साल की शुरुआत में 104.7 था। इसका मतलब है कि रुपये अब अधिक मूल्यांकन की स्थिति से बाहर आ चुका है।
कमजोर रुपये का निर्यात पर प्रभाव
विशेषज्ञों का मानना है कि कमजोर रुपये से निर्यातकों को राहत मिल सकती है, क्योंकि इससे उनकी आय में सुधार होता है। हालांकि, आगे की दिशा वैश्विक व्यापार माहौल और अमेरिका के साथ होने वाले समझौतों पर निर्भर करेगी।