×

विश्व के केंद्रीय बैंकों का जेरोम पॉवेल के समर्थन में एकजुटता

हाल ही में, दुनिया के प्रमुख केंद्रीय बैंकों के प्रमुखों ने अमेरिकी केंद्रीय बैंक के प्रमुख जेरोम पॉवेल के समर्थन में एकजुटता दिखाई है। यह समर्थन उस समय आया है जब पॉवेल पर ब्याज दरों में कटौती के लिए राजनीतिक दबाव डाला जा रहा है। इस बयान में केंद्रीय बैंकों की स्वतंत्रता के महत्व को रेखांकित किया गया है। जानें इस घटनाक्रम के पीछे की पूरी कहानी और इसके संभावित प्रभाव।
 

वैश्विक मौद्रिक नीति में महत्वपूर्ण घटनाक्रम

हाल ही में वैश्विक मौद्रिक नीति के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण और असामान्य घटना देखने को मिली है। जानकारी के अनुसार, दुनिया के दस प्रमुख केंद्रीय बैंकों के प्रमुखों ने अमेरिकी केंद्रीय बैंक के प्रमुख जेरोम पॉवेल के समर्थन में एकजुटता दिखाई है। यह समर्थन उस समय आया है जब पॉवेल ने कहा कि उन पर ब्याज दरों में कमी लाने के लिए राजनीतिक दबाव डाला जा रहा है।


संयुक्त बयान का महत्व

यह संयुक्त बयान बीआईएस से जुड़े शीर्ष अधिकारियों और अन्य केंद्रीय बैंकों के प्रमुखों द्वारा जारी किया गया, जिसे बैंक ऑफ इंग्लैंड की आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित किया गया है। बयान में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि केंद्रीय बैंकों की स्वतंत्रता महंगाई नियंत्रण, वित्तीय स्थिरता और आर्थिक संतुलन के लिए एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे किसी भी स्थिति में कमजोर नहीं किया जाना चाहिए।


समूह में शामिल प्रमुख व्यक्ति

इस समूह में क्रिस्टीन लागार्डे, एंड्रयू बेली, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, स्विट्ज़रलैंड, ब्राज़ील, दक्षिण कोरिया और स्वीडन के केंद्रीय बैंक प्रमुख शामिल हैं। सभी ने एक स्वर में कहा कि जेरोम पॉवेल ने अपने कर्तव्यों का पालन पूरी ईमानदारी और सार्वजनिक हित को ध्यान में रखते हुए किया है।


पॉवेल पर राजनीतिक दबाव

यह घटनाक्रम तब सामने आया जब पॉवेल ने आरोप लगाया कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से उन पर ब्याज दरों में भारी कटौती के लिए दबाव डाला जा रहा है। पॉवेल का कहना है कि फेड की इमारत के नवीनीकरण की लागत बढ़ने को आधार बनाकर उन्हें आपराधिक कार्रवाई की धमकी दी गई, जबकि असली उद्देश्य मौद्रिक नीति को प्रभावित करना है।


ब्याज दरों की वर्तमान स्थिति

अमेरिका में दिसंबर की मौद्रिक नीति समीक्षा के बाद प्रभावी ब्याज दर 3.64 प्रतिशत है, और अधिकांश वैश्विक विश्लेषकों का मानना है कि मजबूत श्रम बाजार को देखते हुए अगली बैठक में दरों को स्थिर रखा जा सकता है। फिर भी, राजनीतिक स्तर पर दबाव बना हुआ है, क्योंकि कम ब्याज दरों से सरकारी घाटे की फंडिंग सस्ती हो जाती है।


भारत और अन्य देशों की अनुपस्थिति

दिलचस्प बात यह है कि इस पहल में दुनिया की दस सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के अधिकांश केंद्रीय बैंक शामिल रहे, लेकिन भारत, चीन, जापान और रूस इसमें शामिल नहीं हुए हैं। भारतीय रिज़र्व बैंक से इस विषय पर पूछे गए सवालों का समाचार लिखे जाने तक कोई जवाब नहीं मिला है।