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वैश्विक बाजारों में तेल की कीमतों में वृद्धि से चिंता का माहौल

वैश्विक बाजारों में बुधवार को तेल की कीमतों में वृद्धि के कारण चिंता का माहौल बना हुआ है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने कच्चे तेल की कीमतों को 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंचा दिया है। इस स्थिति ने निवेशकों में महंगाई की आशंका को बढ़ा दिया है। जानें कि कैसे यह स्थिति शेयर बाजारों और बांड बाजारों को प्रभावित कर रही है और केंद्रीय बैंकों के सामने नई चुनौतियाँ पेश कर रही है।
 

वैश्विक बाजारों में चिंता का माहौल

बुधवार को वैश्विक बाजारों में फिर से चिंता का माहौल देखने को मिला। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने कच्चे तेल की कीमतों को बढ़ा दिया है। ब्रेंट कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गया है। इसके साथ ही निवेशकों में यह चिंता बढ़ गई है कि महंगा ईंधन वैश्विक स्तर पर महंगाई को फिर से बढ़ा सकता है।


ब्रेंट कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि

ब्रेंट कच्चे तेल का प्रमुख वायदा अनुबंध बुधवार को 100.19 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया, जो 24 जुलाई के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। उस समय अमेरिका और ईरान के बीच एक समझौते की उम्मीद थी, जिससे तेल की कीमतों में गिरावट आई थी।


सैन्य तनाव का प्रभाव

हालिया जानकारी के अनुसार, अमेरिका ने रातभर की कार्रवाई में ईरान के कच्चे तेल से जुड़े पांच जहाजों को निशाना बनाया। इसके जवाब में, ईरान ने जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल हमले किए। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि वाशिंगटन ईरानी तेल टैंकरों के खिलाफ कार्रवाई जारी रखेगा।


शेयर बाजारों पर असर

इस सैन्य तनाव का असर शेयर बाजारों पर भी पड़ा है। अमेरिका के प्रमुख शेयर सूचकांक जैसे एसएंडपी 500, डाउ जोंस और नैस्डैक में मामूली गिरावट देखी गई। यूरोप के शेयर बाजार भी एक सप्ताह के निचले स्तर पर पहुंच गए हैं, जहां औद्योगिक और बैंकिंग कंपनियों के शेयरों पर दबाव बढ़ा है।


एशियाई बाजारों की स्थिति

हालांकि, एशियाई बाजारों में स्थिति मिली-जुली रही। तकनीकी कंपनियों के शेयरों में सुधार जारी रहा, जबकि एआई से जुड़ी कंपनियों में निवेशकों की रुचि ने इस क्षेत्र को सहारा दिया है। फिर भी, महंगे तेल और युद्ध की आशंका के कारण बाजार में जोखिम लेने की प्रवृत्ति कमजोर बनी हुई है।


विश्लेषकों की राय

स्विट्जरलैंड की वित्तीय संस्था स्विसकोट की वरिष्ठ विश्लेषक इपेक ओजकारडेस्काया ने कहा कि युद्ध के कारण तेल की कीमतों में वृद्धि ने निवेशकों की जोखिम लेने की इच्छा को कमजोर किया है। गर्मियों में शांति समझौते की उम्मीदें अब कमजोर होती दिखाई दे रही हैं।


भविष्य की चुनौतियाँ

विश्लेषकों का मानना है कि 100 डॉलर की कीमत मुख्य रूप से मनोवैज्ञानिक सीमा है। उनका कहना है कि मांग पर बड़ा असर डालने के लिए कच्चे तेल की कीमत को करीब 150 डॉलर तक पहुंचना होगा। हालांकि, डीजल की बढ़ती कीमतें महंगाई और सेवा क्षेत्र की लागत को प्रभावित कर सकती हैं।


केंद्रीय बैंकों की चुनौतियाँ

तेल की कीमतों में तेज वृद्धि से केंद्रीय बैंकों के सामने नई चुनौतियाँ आ सकती हैं। महंगाई बढ़ने की आशंका के कारण ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद कमजोर पड़ सकती है। यूरोपीय केंद्रीय बैंक की बैठक गुरुवार को होने वाली है, जबकि अमेरिकी केंद्रीय बैंक अगले सप्ताह ब्याज दरों पर निर्णय करेगा।


बांड बाजार पर प्रभाव

बांड बाजार भी इस तनाव से प्रभावित हुआ है। महंगाई की चिंता के चलते हाल के सप्ताहों में बांड पर मिलने वाली रिटर्न रेट बढ़ी है। अमेरिका और ईरान के बीच हालिया हमलों के बाद, प्रमुख सरकारी बांडों की रिटर्न दर कई दशकों के ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है। इससे सरकारों की उधारी महंगी होने और वैश्विक वित्तीय संस्थानों पर दबाव बढ़ने की चिंता पैदा हुई है। आगे तेल की कीमत और मध्य पूर्व में संघर्ष की दिशा वैश्विक बाजारों की चाल को निर्धारित करेगी।