सुभाष चंद्रा के दिवाला समाधान पर बैंकों ने एनसीएलएटी में याचिका दायर की
बैंकों की याचिका का विवरण
एस्सेल समूह के चेयरमैन सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत दिवाला समाधान प्रक्रिया के खिलाफ बैंकों ने सोमवार को राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) में याचिका दायर की। इस याचिका में उन आदेशों को चुनौती दी गई है, जिसमें चंद्रा को 6.5 करोड़ रुपये के भुगतान की योजना को मंजूरी दी गई है, जबकि बैंकों के दावे लगभग 22,006.57 करोड़ रुपये हैं। एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अपीलीय न्यायाधिकरण की पीठ के समक्ष मामले का उल्लेख किया और त्वरित सुनवाई की मांग की।
सुनवाई का अनुरोध
मेहता ने केनरा बैंक और यूनियन बैंक की ओर से भी पेश होते हुए कहा कि यदि एनसीएलटी का आदेश जारी रहा, तो यह दिवाला एवं ऋण शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) के मूल उद्देश्य को बाधित करेगा। उन्होंने दोपहर दो बजे मामले की सुनवाई करने का अनुरोध किया, लेकिन अपीलीय न्यायाधिकरण ने इसे मंगलवार के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई।
एनसीएलटी का निर्णय
सोमवार को एनसीएलटी की विशेष पीठ ने औपचारिक आदेश पारित किया, जिसमें तीसरे सदस्य नीलेश शर्मा का निर्णय शामिल था। शर्मा ने न्यायिक सदस्य अशोक कुमार भारद्वाज और तकनीकी सदस्य रीना सिन्हा पुरी के बीच मतभेद के बाद चंद्रा की भुगतान योजना को मंजूरी दी। एनसीएलटी का अंतिम आदेश अभी न्यायाधिकरण के पोर्टल पर उपलब्ध नहीं है।
वित्तीय संस्थानों की आपत्ति
शर्मा ने पिछले मंगलवार को आईबीसी की धारा 114 के तहत योजना को मंजूरी दी थी। उन्होंने वित्तीय संस्थानों की आपत्ति को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि प्रस्तावित वसूली इतनी कम है कि इसे मंजूरी नहीं दी जानी चाहिए। बैंकों ने योजना को 'अव्यावहारिक और गैरकानूनी' बताते हुए आपत्ति जताई थी।
चंद्रा के परिवार की भूमिका
वित्तीय संस्थानों ने आरोप लगाया कि चंद्रा के परिवार से जुड़ी पांच इकाइयों के पास कुल मतदान अधिकार का 61.78 प्रतिशत हिस्सा है, जिसने चंद्रा की व्यक्तिगत दिवाला समाधान योजना को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। योजना में केवल 6.5 करोड़ रुपये के भुगतान का प्रस्ताव है।
सहयोगी इकाइयों का विवाद
असहमत वित्तीय संस्थानों ने यह भी कहा कि ये पांचों संस्थाएं चंद्रा के सहयोगी हैं और उन्हें पुनर्भुगतान योजना पर मतदान से रोकना चाहिए था। इन संस्थाओं के मतों से कर्जदाताओं की समिति में योजना को 80.814 प्रतिशत मंजूरी मिली थी।
फॉरेंसिक ऑडिट की मांग
केनरा बैंक ने फॉरेंसिक ऑडिट की मांग की थी, लेकिन इसकी अल्पमत हिस्सेदारी के कारण इसे अनुमति नहीं दी गई। हालांकि, शर्मा ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि किसी इकाई को 'एसोसिएट' तभी माना जा सकता है जब कर्जदार के पास उसकी शेयर पूंजी का 51 प्रतिशत या उससे अधिक हिस्सा हो।
समाधान पेशेवर का मूल्यांकन
शर्मा ने कहा कि चंद्रा की व्यक्तिगत संपत्ति का मूल्य योजना के तहत पेश की गई राशि से काफी कम था। यदि योजना को खारिज किया गया, तो ऋणदाताओं को अधिक वसूली की संभावना नहीं थी।