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सुरजीत भल्ला ने भारत की जीडीपी वृद्धि पर राजनीतिक हेरफेर के आरोपों को किया खारिज

भारत की 7.8 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि दर पर चल रही बहस के बीच, अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोपों को खारिज किया है। उन्होंने कहा कि आंकड़ों में बदलाव को खपत, निवेश और आयात जैसे आर्थिक संकेतकों के संदर्भ में देखना चाहिए। भल्ला ने यह भी बताया कि यदि सरकार का उद्देश्य जीडीपी वृद्धि को कृत्रिम रूप से बढ़ाना होता, तो खपत के आंकड़ों में वृद्धि दिखाई देती। इसके अलावा, उन्होंने निवेश के आंकड़ों और आयात की भूमिका पर भी प्रकाश डाला।
 

भारत की जीडीपी वृद्धि पर चर्चा


भारत की 7.8 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि दर को लेकर चल रही बहस के बीच, अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने किसी भी राजनीतिक हस्तक्षेप से इनकार किया है। उनका कहना है कि आंकड़ों में बदलाव को केवल सरकारी दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि खपत, निवेश और आयात जैसे आर्थिक संकेतकों के संदर्भ में देखना चाहिए।


राजनीतिक हेरफेर के आरोपों का खंडन

सुरजीत भल्ला ने भारत के संशोधित जीडीपी आंकड़ों पर उठ रहे सवालों का जवाब देते हुए कहा कि अब तक ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला है जो यह साबित करे कि विकास दर को बढ़ाने के लिए जानबूझकर आंकड़ों में छेड़छाड़ की गई है। एक मीडिया चैनल से बातचीत में उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सरकारी आंकड़ों की जांच करना और उन पर सवाल उठाना उचित है। हालांकि, उन्होंने खुद आंकड़ों का विश्लेषण करने के बाद राजनीतिक उद्देश्यों से बदलाव के आरोपों को सही नहीं पाया।


खपत के आंकड़ों का महत्व

भल्ला ने अपने तर्क में निजी खपत को एक महत्वपूर्ण आधार बताया। उनका कहना है कि यदि किसी सरकार का उद्देश्य जीडीपी वृद्धि को कृत्रिम रूप से बढ़ाना होता, तो वह खपत के आंकड़ों को मजबूत दिखाने का प्रयास करती। लेकिन संशोधित आंकड़ों में ऐसा नहीं दिखता। उन्होंने बताया कि नए आंकड़ों में खपत की वृद्धि पहले के आंकड़ों की तुलना में कम दिखाई गई है, जो जीडीपी में हेरफेर के आरोपों को कमजोर करता है।


निवेश के आंकड़ों पर चर्चा

भल्ला ने निवेश के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए कहा कि निजी क्षेत्र से प्राप्त कई स्वतंत्र आंकड़े अर्थव्यवस्था में निवेश के बढ़ने का संकेत देते हैं। उनके अनुसार, कंपनियों और अन्य निजी स्रोतों से मिले संकेतों में निवेश गतिविधियों में तेजी दिखाई देती है। चूंकि निवेश सीधे जीडीपी में योगदान करता है, इसलिए संशोधित राष्ट्रीय खातों में इसकी मजबूत स्थिति को विभिन्न आंकड़ों के साथ जोड़कर देखना आवश्यक है।


आयात और बेस ईयर पर विचार

भल्ला ने आयात और आयात कीमतों को भी जीडीपी की तस्वीर समझने के लिए महत्वपूर्ण बताया। उनका कहना है कि आयात जीडीपी गणना पर प्रभाव डालते हैं और आयात कीमतों में बदलाव से विशेषकर विनिर्माण जैसे क्षेत्रों के आंकड़ों पर असर पड़ सकता है।


उन्होंने बेस ईयर बदलने पर होने वाली बहस पर भी सवाल उठाया और कहा कि तेजी से बदलती अर्थव्यवस्था में राष्ट्रीय खातों को समय-समय पर संशोधित करना आवश्यक है। उन्होंने भारतीय सांख्यिकी विशेषज्ञों को सतर्क और रूढ़िवादी बताते हुए कहा कि अब तक आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का कोई सबूत नहीं मिला है।