स्ट्रेट ऑफ होर्मुज संकट: क्या भारत की ऊर्जा सुरक्षा को खतरा है?
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का महत्व
नई दिल्ली: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, जो विश्व की ऊर्जा आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण मार्ग है, से प्रतिदिन लगभग 2.1 करोड़ बैरल तेल का परिवहन होता है। यदि यहां कोई गंभीर संकट उत्पन्न होता है, तो यह केवल पेट्रोल और डीजल की कीमतों को प्रभावित नहीं करता, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी हिला देता है। 2026 का होर्मुज संकट इस खतरे को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।
संकट का प्रभाव
मैकिंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट के अनुसार, संकट के चरम पर लगभग 14 प्रतिशत वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति प्रभावित हुई। यह प्रभाव 1970 के दशक के प्रमुख तेल संकटों से दोगुना और 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान हुए व्यवधान से लगभग छह गुना अधिक था। हालांकि बाजार पूरी तरह से ठप नहीं हुआ, लेकिन दबाव स्पष्ट था।
होर्मुज की महत्वपूर्ण भूमिका
2025 की अंतिम तिमाही में, इस मार्ग से प्रतिदिन लगभग 21 मिलियन बैरल तेल का प्रवाह हुआ, जिसमें 16 मिलियन बैरल कच्चा तेल और शेष रिफाइंड उत्पाद शामिल थे। यह केवल एक समुद्री मार्ग नहीं है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा व्यापार की रीढ़ है। यहां किसी भी प्रकार की रुकावट तेल, गैस और संबंधित व्यापार पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है। संकट के दौरान, आपूर्ति में कमी का लगभग 45 प्रतिशत हिस्सा खपत में कमी के माध्यम से संभाला गया। यह लगभग 6.8 मिलियन बैरल प्रतिदिन के बराबर था। चीन ने अपने आयात में कमी की, जबकि अमेरिका ने अपने निर्यात को बढ़ाया। भंडार और वैकल्पिक मार्गों ने भी सहायता की, लेकिन यह स्पष्ट हो गया कि ये उपाय हमेशा के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
वैकल्पिक मार्गों की सीमाएं
सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन जैसे विकल्पों में भी समस्याएं आईं। इससे यह समझ में आया कि केवल वैकल्पिक मार्ग बनाने से ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होती; उनकी क्षमता और कनेक्टिविटी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
वैश्विक ऊर्जा व्यापार का लगभग दो-तिहाई हिस्सा समुद्री चोकपॉइंट्स से गुजरता है। मलक्का स्ट्रेट से प्रतिदिन 23 मिलियन बैरल तेल का परिवहन होता है। सुएज कैनाल, बाब अल-मंदेब, पनामा कैनाल और केप ऑफ गुड होप भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। रेड सी में तनाव ने यह दिखाया कि मार्ग बदलने से समय और लागत दोनों में वृद्धि होती है।
भारत के लिए सीख
भारत एक बड़ा ऊर्जा आयातक है, और होर्मुज जैसे मार्ग पर संकट का सीधा प्रभाव यहां पड़ सकता है। इसलिए, कच्चे तेल की आपूर्ति में विविधता, रणनीतिक भंडार, वैकल्पिक मार्गों और आवश्यकता पड़ने पर अन्य ईंधनों का उपयोग आवश्यक हो गया है। 2030 तक बेहतर तैयारी से 35 से 70 प्रतिशत तक की कमी को कवर किया जा सकता है, लेकिन चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं।