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भारत की शिक्षा प्रणाली: उपस्थिति से सीखने की ओर बदलाव की आवश्यकता

भारत की शिक्षा प्रणाली में उपस्थिति पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय सीखने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। 2022 की ASER रिपोर्ट ने यह दर्शाया है कि कई बच्चे बुनियादी शिक्षा से वंचित हैं। इस लेख में शिक्षा प्रणाली की संरचना, PISA परीक्षण के परिणाम, और सुधार की दिशा में आवश्यक कदमों पर चर्चा की गई है। क्या भारत अपनी शिक्षा प्रणाली में आवश्यक बदलाव कर पाएगा? जानने के लिए पढ़ें।
 

शिक्षा प्रणाली की वर्तमान स्थिति

भारत की शिक्षा व्यवस्था अब कक्षा में 'उपस्थिति' पर केंद्रित हो गई है, जबकि 'सीखने' पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि बच्चे स्कूल में होते हैं, लेकिन उनकी सीखने की क्षमता पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा। यह केवल एक साधारण भ्रष्टाचार नहीं है, बल्कि एक नीति-तर्क है जो कागज पर तो सही लगता है, लेकिन वास्तविकता में यह राष्ट्र की शिक्षा क्षमता को कमजोर कर रहा है।


ASER रिपोर्ट का खुलासा

2022 में आई शिक्षा की वार्षिक स्थिति रिपोर्ट (ASER) ने एक गंभीर सच्चाई को उजागर किया है। रिपोर्ट के अनुसार, पांचवीं कक्षा के आधे से अधिक छात्र दूसरी कक्षा का पाठ भी ठीक से नहीं पढ़ सकते और लगभग दो-तिहाई बच्चे साधारण भाग (division) नहीं कर पाते। ये बच्चे स्कूल में उपस्थित होते हैं, लेकिन सीखने के स्तर पर उनकी स्थिति चिंताजनक है।


शिक्षा प्रणाली की संरचना

भारत ने एक विशाल शिक्षा प्रणाली स्थापित की है, लेकिन यह संरचना भीतर से खोखली है। यह एक उत्तर-औपनिवेशिक विचार पर आधारित है, जिसका उद्देश्य शिक्षा को सभी तक पहुँचाना था। हालांकि, इस प्रक्रिया में कई त्रुटियाँ हुईं। स्कूलों की संख्या बढ़ाने और उपस्थिति सुनिश्चित करने के बावजूद, वास्तविक सीखने की प्रक्रिया को नजरअंदाज किया गया।


PISA परीक्षण और वैश्विक रैंकिंग

2009 में PISA परीक्षण ने भारतीय छात्रों की स्थिति को और स्पष्ट किया। भारतीय छात्र अन्य देशों की तुलना में काफी पीछे रहे। इस असफलता के कारण भारत ने आगे की रैंकिंग में भाग लेना बंद कर दिया। विश्व बैंक के मानव पूंजी सूचकांक में भी भारत का स्थान 174 देशों में 116वां है।


शिक्षा का प्रमाणपत्र जाल

ग्रामीण भारत में शिक्षा का प्रमाणपत्र अब कौशल का प्रतीक नहीं, बल्कि सरकारी नौकरी की उम्मीद का प्रतीक बन गया है। यह स्थिति शिक्षा प्रणाली को एक नई दिशा दे रही है। 2009 का Right to Education Act भी इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था, लेकिन इससे सीखने की जिम्मेदारी कमजोर हो गई।


भविष्य की चुनौतियाँ

भारत की जनसांख्यिकीय संरचना और शिक्षा की स्थिति एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। यदि बड़ी आबादी बुनियादी समझ और विश्लेषण से वंचित रह जाती है, तो यह एक दीर्घकालिक बोझ बन सकती है। चीन और वियतनाम ने इस खतरे को गंभीरता से लिया है, लेकिन भारत ने अभी तक इस दिशा में निर्णायक कदम नहीं उठाए हैं।


नीति में बदलाव की आवश्यकता

नीति रिपोर्ट में 'Foundational Literacy and Numeracy' पर जोर दिया गया है, लेकिन समस्या की पहचान और समाधान एक समान नहीं हैं। यदि प्रणाली की मूल प्रेरणा नहीं बदली, तो केवल प्रशिक्षण या तकनीक पर्याप्त नहीं होंगे। तीन स्तरों पर बदलाव आवश्यक हैं: जवाबदेही का विकेंद्रीकरण, रटंत संस्कृति से बाहर निकलना, और सीखने को मापना।


निष्कर्ष

भारत के पास केवल एक पीढ़ी का समय है—वर्तमान प्राथमिक विद्यालय के बच्चों—इस अंतर को भरने के लिए। अब चुनौती मानसिक संरचना को बदलने की है। बच्चे कक्षा में उपस्थित हैं, लेकिन क्या हम उन्हें वास्तव में कुछ सीखने योग्य देंगे?