×

स्कूलों में बच्चों की संख्या में गिरावट: 49 लाख कम हुए नामांकन

हाल ही में शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों से पता चलता है कि स्कूलों में बच्चों की संख्या में लगातार गिरावट आ रही है। 2024-25 में 11 लाख कम बच्चों ने स्कूलों में दाखिला लिया है, जिससे पिछले दो वर्षों में कुल 49 लाख बच्चों की कमी हुई है। सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या में कमी और निजी स्कूलों में बढ़ती रुचि अभिभावकों की बदलती प्राथमिकताओं को दर्शाती है। इसके पीछे घटती जन्मदर और महंगी शिक्षा जैसे कारण भी शामिल हैं।
 

शिक्षा के क्षेत्र में चिंताजनक आंकड़े

नई दिल्ली: देश के शिक्षा क्षेत्र में एक गंभीर स्थिति उभरकर सामने आई है। लगातार दूसरे वर्ष, स्कूलों में दाखिला लेने वाले बच्चों की संख्या में उल्लेखनीय कमी आई है। शिक्षा मंत्रालय द्वारा गुरुवार को जारी किए गए नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, 2024-25 में पिछले वर्ष की तुलना में 11 लाख कम बच्चों ने स्कूलों में दाखिला लिया है।


इन आंकड़ों का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों से बच्चों का रुझान कम हो रहा है, जबकि निजी स्कूलों में दाखिले के लिए अभिभावकों की भीड़ बढ़ रही है। यह बदलाव अभिभावकों की बदलती प्राथमिकताओं को दर्शाता है।


पिछले दो वर्षों में बच्चों की संख्या में कमी

दो साल में 49 लाख घटे बच्चे


जिला स्तर पर एकत्रित आंकड़ों (UDISE+) के अनुसार, प्री-प्राइमरी से लेकर हायर सेकेंडरी तक, 2024-25 में कुल 24.69 करोड़ नामांकन हुए। यह संख्या 2023-24 में 24.80 करोड़ और 2022-23 में 25.18 करोड़ थी। इस प्रकार, पिछले दो वर्षों में स्कूली बच्चों की संख्या में 49 लाख की कमी आई है।


सरकारी और निजी स्कूलों के बीच का अंतर

सरकारी बनाम प्राइवेट का अंतर बढ़ा


आंकड़े स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या में लगातार गिरावट आ रही है। 2022-23 में सरकारी स्कूलों में 12.75 करोड़ बच्चे थे, जो 2024-25 में घटकर 12.16 करोड़ रह गए। इसके विपरीत, निजी स्कूलों में छात्रों की संख्या में वृद्धि हुई है। 2022-23 में निजी स्कूलों में 8.42 करोड़ बच्चे थे, जो 2024-25 में बढ़कर 9.59 करोड़ हो गए।


घटती जन्मदर का प्रभाव

मंत्रालय ने बताई घटती जन्मदर की आशंका


शिक्षा मंत्रालय का कहना है कि नामांकन में इस गिरावट का एक संभावित कारण देश में घटती जन्मदर हो सकता है। मंत्रालय ने बताया कि प्री-प्राइमरी स्तर पर दाखिलों में कमी जनसंख्या वृद्धि दर में कमी की ओर संकेत करती है। हालांकि, इसकी अंतिम पुष्टि नई जनगणना के आंकड़ों के बाद ही हो सकेगी।


यह डेटा जनसंख्या विज्ञानियों के उन अनुमानों को भी समर्थन देता है जो लंबे समय से कह रहे हैं कि भारत में जन्मदर कम हो रही है। महंगी शिक्षा, स्वास्थ्य और बढ़ते खर्चों के कारण परिवार अब कम बच्चे पैदा करने को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिसका असर स्कूली दाखिलों पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है।