×

उत्तर प्रदेश में टीबी नियंत्रण में सफलता: मरीजों की संख्या में कमी

उत्तर प्रदेश में टीबी मरीजों की संख्या में कमी आई है, जिससे यह राज्य टीबी नियंत्रण में देश के शीर्ष छह राज्यों में शामिल हो गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर पहचान और दवाओं का पूरा कोर्स करना आवश्यक है। राज्य ने 31 लाख से अधिक लोगों की जांच की और 2.06 लाख पोषण किट वितरित की हैं। जानें इस अभियान में जनप्रतिनिधियों की भागीदारी और टीबी के प्रति जागरूकता फैलाने के प्रयासों के बारे में।
 

टीबी की राजधानी: उत्तर प्रदेश

लखनऊ। भारत में टीबी (क्षय रोग) के सबसे अधिक मरीज उत्तर प्रदेश में हैं, जहां हर पांचवां टीबी मरीज इसी राज्य से है। इसे 'टीबी की राजधानी' भी कहा जाता है। हालांकि, मरीजों की संख्या में वृद्धि के बावजूद, राज्य ने टीबी पर नियंत्रण पाने में महत्वपूर्ण प्रगति की है। समय पर पहचान, जांच, उपचार और पोषण सहायता जैसे मानकों पर बेहतर कार्य के चलते उत्तर प्रदेश अब देश के शीर्ष छह राज्यों में शामिल हो गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि टीबी को समाप्त करने के लिए मरीजों की पहचान और दवाओं का पूरा कोर्स करना आवश्यक है।


टीबी मरीजों की संख्या में उतार-चढ़ाव

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2022 में उत्तर प्रदेश में लगभग पांच लाख टीबी के मरीज थे, जो 2023 में बढ़कर 6.24 लाख हो गए। 2024 में यह संख्या 6.73 लाख तक पहुंच गई, जो केंद्रीय टीबी विभाग के लक्ष्य से अधिक थी। इसके बाद, 7 दिसंबर 2024 से 19 अक्टूबर 2025 के बीच उच्च जोखिम वाले 2.38 करोड़ लोगों की जांच की गई, जिसमें 5.14 लाख लोगों में टीबी की पुष्टि हुई।


इस वर्ष टीबी के मरीजों में कमी

राज्य क्षय रोग अधिकारी डॉ. ऋषि कुमार सक्सेना ने बताया कि 24 मार्च से जुलाई के पहले सप्ताह तक 31 लाख से अधिक लोगों की टीबी जांच की गई। इसके लिए 25,821 आयुष्मान आरोग्य शिविरों का आयोजन किया गया। उच्च जोखिम वाले 26 हजार से अधिक गांवों में से 24 हजार क्षेत्रों को कवर किया गया। अब तक राज्य में 1.85 लाख नए टीबी मरीजों की पहचान की गई है। डॉ. सक्सेना का कहना है कि 2025 से अब तक के आंकड़ों से यह स्पष्ट है कि 2026 में भी टीबी के मरीजों की संख्या में कमी आएगी।


हवाई अड्डों पर टीबी जांच

एसटीओ ने बताया कि उत्तर प्रदेश देश का पहला राज्य है जहां अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय हवाई अड्डों पर टीबी की जांच की जा रही है। चौधरी चरण सिंह अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (लखनऊ), नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट (जेवर), लाल बहादुर शास्त्री अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (वाराणसी) और महायोगी गोरखनाथ हवाई अड्डा (गोरखपुर) पर 800 लोगों की टीबी की जांच की गई।


अभियान में जनप्रतिनिधियों की भागीदारी

डॉ. सक्सेना के अनुसार, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, स्वास्थ्य मंत्री और उत्तर प्रदेश के अन्य 212 मंत्रियों ने 100 दिवसीय गहन टीबी उन्मूलन अभियान में भाग लिया। यूपी समेत देशभर के 182 सांसद, 909 विधायक और विधान परिषद सदस्य, राज्य के 8458 स्कूलों के चार लाख छात्र-छात्राएं, और पांच हजार महाविद्यालयों के तीन लाख से अधिक युवा टीबी के खिलाफ जन जागरूकता अभियान में शामिल हुए।


पोषण किट का वितरण

इस दौरान, 9,000 नगरीय निकाय प्रतिनिधियों और 34,000 पंचायती राज जनप्रतिनिधियों ने गांव-गांव जाकर लोगों को टीबी के प्रति जागरूक किया। 13,302 टीबी विजेताओं ने भी अपने क्षेत्रों में जागरूकता फैलाने का कार्य किया। मरीजों को पोषण और सामाजिक सहायता देने के लिए 5,000 से अधिक नए निक्षय मित्रों का पंजीकरण किया गया है, जिनकी मदद से 2.06 लाख से अधिक पोषण किट वितरित की जा चुकी हैं।


टीबी का संक्रामक स्वरूप

बलरामपुर अस्पताल के वरिष्ठ क्षय रोग विशेषज्ञ डॉ. आनंद कुमार गुप्ता ने बताया कि टीबी एक संक्रामक बीमारी है, जो माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस जीवाणु से होती है। यह शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकती है, लेकिन लगभग 90 प्रतिशत मामलों में यह फेफड़ों में होती है। यदि यह अन्य अंगों को प्रभावित करती है, तो इसे एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी (EPTB) कहा जाता है।


संक्रमण और बीमारी का अंतर

डॉ. गुप्ता के अनुसार, टीबी के जीवाणु से संक्रमित हर व्यक्ति बीमार नहीं होता। जब जीवाणु शरीर में निष्क्रिय रहता है, तो इसे लेटेंट टीबी कहा जाता है। इसमें कोई लक्षण नहीं होते और व्यक्ति स्वस्थ महसूस करता है। रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने पर जीवाणु सक्रिय हो जाता है। केवल 10 प्रतिशत लोगों को ही सक्रिय टीबी होती है, और इसका इलाज न करने से यह घातक हो सकता है।


अधूरा इलाज खतरनाक

क्षय रोग विशेषज्ञ ने बताया कि टीबी का मरीज जब छींकता, खांसता या थूकता है, तो हवा में टीबी के जीवाणु फैलते हैं। कोई भी व्यक्ति जो इस हवा को सांस में लेता है, संक्रमित हो सकता है। टीबी का इलाज संभव है, बशर्ते मरीज छह महीने तक नियमित दवाइयां लें। बिना डॉक्टर की सलाह के दवा बंद करने से यह बीमारी दोबारा और गंभीर रूप में लौट सकती है। बलरामपुर अस्पताल की ओपीडी में रोजाना सात से आठ टीबी के मरीज आ रहे हैं।