×

जावेद अख्तर ने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में साझा किए विचार: भाषा, धर्मनिरपेक्षता और सिनेमा पर चर्चा

जावेद अख्तर ने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में अपने विचार साझा करते हुए भाषा, धर्मनिरपेक्षता और सिनेमा के बदलते स्वरूप पर चर्चा की। उन्होंने अपने बचपन की यादों को ताजा करते हुए बताया कि उनकी मां और दादी का उन पर गहरा प्रभाव रहा है। साथ ही, उन्होंने युवाओं को जीवन का महत्वपूर्ण सबक दिया और सिनेमा के विकास पर भी अपने विचार रखे। जानें उनके विचारों की गहराई और अनुभवों की कहानी।
 

जावेद अख्तर का प्रभावशाली संवाद


मुंबई: प्रसिद्ध गीतकार और लेखक जावेद अख्तर अपनी स्पष्ट राय और तर्कशीलता के लिए जाने जाते हैं। हाल ही में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में एक सत्र के दौरान, उन्होंने भाषा, परिवार, धर्मनिरपेक्षता और सिनेमा के विकास पर अपने विचार साझा किए। इस चर्चा में उन्होंने दर्शकों के सवालों का बेबाकी से उत्तर दिया और अपने व्यक्तिगत अनुभव भी साझा किए।


बचपन की यादें और भाषाओं पर विचार

सत्र के दौरान, जावेद अख्तर ने अपने बचपन की यादों को ताजा करते हुए बताया कि उनकी मां और दादी का उनके व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव रहा है। उन्होंने संस्कृत और उर्दू जैसी भाषाओं पर भी अपने विचार रखे, जो श्रोताओं के लिए आकर्षण का केंद्र बन गए।


संस्कृत और उर्दू पर जावेद अख्तर की स्पष्ट राय

जब एक दर्शक ने पूछा कि उर्दू और संस्कृत में से कौन सी भाषा पुरानी है, तो जावेद अख्तर ने बिना किसी संकोच के कहा कि यह सवाल ही गलत है। संस्कृत दुनिया की दूसरी सबसे पुरानी जीवित भाषा है, जबकि उर्दू तो हजार साल भी पुरानी नहीं है। उन्होंने इसे संस्कृत की छोटी बहन बताया।


उन्होंने यह भी बताया कि तमिल को सबसे पुरानी जीवित भाषा माना जाता है, उसके बाद संस्कृत का स्थान आता है। भाषाओं की महत्ता उनकी उम्र से नहीं, बल्कि उनके सांस्कृतिक योगदान से तय होनी चाहिए, ऐसा उनका मानना है।


भावुक जावेद अख्तर

बातचीत के दौरान जावेद अख्तर भावुक हो गए। उन्होंने बताया कि उनकी मां का निधन उनके आठवें जन्मदिन के अगले दिन हुआ था। उन्होंने कहा कि उनकी मां ने भाषा को उनके लिए एक मजेदार अनुभव बना दिया। आज भी जब वे स्क्रिप्ट लिखते हैं, तो उन्हें अपनी मां से सीखी बातें याद आती हैं।


युवाओं को जीवन का महत्वपूर्ण संदेश

एक युवा के सवाल पर, जो अकादमिक प्रतिस्पर्धा से परेशान था, जावेद अख्तर ने जीवन का महत्वपूर्ण सबक दिया। उन्होंने कहा कि किसी की प्रतिभा से डरने के बजाय, उसकी सराहना करनी चाहिए। असली प्रतियोगिता खुद से होनी चाहिए।


धर्मनिरपेक्षता पर जावेद अख्तर का दृष्टिकोण

धर्मनिरपेक्षता के बारे में जावेद अख्तर ने कहा कि यह कोई उपदेश नहीं, बल्कि व्यवहार से सीखी जाने वाली चीज है। उन्होंने अपने दादा-दादी के एक किस्से के माध्यम से इसे समझाया, जिसमें उनकी दादी ने धार्मिक शिक्षा के लिए पैसे देने से मना कर दिया था।


बॉलीवुड के बदलते स्वरूप पर जावेद अख्तर

सिनेमा के बदलते स्वरूप पर जावेद अख्तर ने कहा कि आज का बॉलीवुड उनके शुरुआती दिनों से काफी अलग है। उन्होंने कहा कि आज के असिस्टेंट डायरेक्टर हीरो को उसके नाम से बुलाते हैं, जो उनके समय में असंभव था। उन्होंने इन बदलावों को सकारात्मक मानते हुए कहा कि सिनेमा हमेशा समाज के मूल्यों को दर्शाता है।