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जावेद अख्तर: हिंदी सिनेमा के महानायक का जन्मदिन

आज, 17 जनवरी 2026 को, हम जावेद अख्तर के जन्मदिन का जश्न मना रहे हैं। उनकी अद्वितीय यात्रा में 40 से अधिक फिल्मों की पटकथा लेखन, हजारों संवाद और 1000 से ज्यादा गाने शामिल हैं। जावेद ने हिंदी सिनेमा में एंग्री यंग मैन की छवि बनाई और कई अमर संवाद रचे। उनके योगदान ने न केवल बॉक्स ऑफिस पर सफलता दिलाई, बल्कि आम जनता की भावनाओं को भी पर्दे पर जीवंत किया। जानें उनके जीवन और कार्यों के बारे में और कैसे उन्होंने सिनेमा को नया चेहरा दिया।
 

जावेद अख्तर का जन्मदिन: एक अद्वितीय यात्रा


मुंबई: हिंदी फिल्म उद्योग में कुछ व्यक्तित्व ऐसे हैं जो अपनी लेखनी से जादू बिखेरते हैं, और उनमें जावेद अख्तर का नाम सबसे ऊपर है। आज, 17 जनवरी 2026 को, हम उनके जन्मदिन का जश्न मना रहे हैं और उनकी अद्भुत यात्रा को याद कर रहे हैं, जिसमें उन्होंने 40 से अधिक फिल्मों के लिए पटकथा लिखी, हजारों संवाद दिए और 1000 से ज्यादा गाने रचे। उनकी लेखनी ने न केवल बॉक्स ऑफिस पर सफलता हासिल की, बल्कि आम जनता की भावनाओं को भी पर्दे पर जीवंत किया।


1970-80 के दशक में बॉलीवुड का परिवर्तन

जावेद अख्तर का जन्म 17 जनवरी 1945 को ग्वालियर में हुआ। उनके पिता, जान निसार अख्तर, भी एक प्रसिद्ध शायर और गीतकार थे। मुंबई में अपने प्रारंभिक संघर्ष के बाद, उन्होंने सलीम खान के साथ एक जोड़ी बनाई, जिसे सलीम-जावेद के नाम से जाना जाता है। इस जोड़ी ने 1970-80 के दशक में बॉलीवुड को पूरी तरह से बदल दिया। उन्होंने कुल 24 फिल्मों की पटकथा लिखी, जिनमें से अधिकांश सुपरहिट साबित हुईं। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी एंग्री यंग मैन की छवि का निर्माण। पहले के नायकों को चॉकलेट बॉय के रूप में देखा जाता था, लेकिन जावेद अख्तर ने अमिताभ बच्चन को एक ऐसा नायक दिया जो गुस्से से भरा और न्याय की लड़ाई लड़ता था।


बेबाक बयानों और ऐतिहासिक रचनाओं का सफर

जंजीर (1973) से उनकी यात्रा शुरू हुई, जहां अमिताभ का किरदार विजय खन्ना ने कहा- 'जब तक बैठने को न कहा जाए, शराफत से खड़े रहो।' यह संवाद आज भी लोगों के बीच चर्चित है। इसके बाद दीवार (1975) आई, जिसमें दो भाइयों की कहानी ने समाज में असमानता को उजागर किया। अमिताभ का संवाद 'मुझे 400 रुपये चाहिए थे... मैंने 10 रुपये कमाए' आज भी याद किया जाता है। उसी वर्ष रिलीज हुई शोले (1975), जिसे भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी फिल्म माना जाता है। गब्बर सिंह के संवाद 'कितने आदमी थे?' और 'ये बसंती इन कट्टों में...' ने फिल्म को अमर बना दिया।


खलनायकों की नई परिभाषा

सलीम-जावेद की अन्य सफल फिल्मों में यादों की बारात, डॉन, त्रिशूल, और मिस्टर इंडिया शामिल हैं। मिस्टर इंडिया में मोगैम्बो का किरदार और संवाद 'मोगैम्बो खुश हुआ!' ने खलनायकों की नई परिभाषा स्थापित की। 1980 के बाद, जावेद अख्तर ने एकल करियर अपनाया और एक गीतकार के रूप में अपनी पहचान बनाई।


पुरस्कारों की झड़ी और परिवार की सफलता

उन्होंने लगान, कल हो ना हो, वीर-जारा, स्वदेश, रॉक ऑन, और ओम शांति ओम जैसी फिल्मों के लिए गाने लिखे। उनके गाने सरल लेकिन गहरे होते हैं, जैसे 'एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा...' और 'कल हो ना हो'। उन्हें 5 नेशनल फिल्म अवॉर्ड और कई फिल्मफेयर अवॉर्ड मिले। 1999 में उन्हें पद्म श्री और 2007 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। उनके बेटे फरहान अख्तर और बेटी ज़ोया अख्तर भी सिनेमा में सफल हैं। जावेद अख्तर की लेखनी ने सिनेमा को नया रूप दिया, आम आदमी की आवाज बनी और बॉक्स ऑफिस पर इतिहास रचा। उनकी रचनाएं आज भी प्रेरणा देती हैं।