दिव्या दत्ता की 'चिरैया': एक गंभीर मुद्दे पर आधारित सशक्त कहानी
दिव्या दत्ता की नई श्रृंखला 'चिरैया' भारतीय ओटीटी पर एक महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दे को उजागर करती है। यह कहानी एक आदर्श परिवार के भ्रम को तोड़ते हुए, वैवाहिक बलात्कार और पितृसत्ता के खिलाफ संघर्ष को दर्शाती है। कमलेश के किरदार के माध्यम से, यह शो महिलाओं को अपनी आवाज पहचानने की प्रेरणा देता है। जियो-हॉटस्टार पर उपलब्ध यह श्रृंखला एक बार जरूर देखी जानी चाहिए।
Apr 2, 2026, 17:50 IST
ओटीटी पर एक नई कहानी
भारतीय ओटीटी प्लेटफॉर्म पर अक्सर जटिल और गहरे विषयों का बोलबाला होता है, लेकिन दिव्या दत्ता की 'चिरैया' अपनी सरलता और 2010 के दशक के टीवी धारावाहिकों की यादों के साथ एक महत्वपूर्ण मुद्दे को उजागर करती है। यह श्रृंखला दिव्य निधि शर्मा द्वारा लिखी गई है और बंगाली शो 'संपूर्ण' का रूपांतरण है, जो एक पारंपरिक भारतीय परिवार के भीतर छिपे कड़वे सच को सामने लाती है।
कहानी: 'परफेक्ट फैमिली' का भ्रम
कहानी कमलेश (दिव्या दत्ता) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक आदर्श बहू, पत्नी और मां की भूमिका निभा रही है। सब कुछ सामान्य लगता है, जब तक कि उसके बेटे अरुण (सिद्धार्थ शॉ) की शादी पूजा (प्रसन्ना बिष्ट) से नहीं होती। कहानी में मोड़ तब आता है जब अरुण अपनी पत्नी पूजा के साथ पहली रात को जबरदस्ती करता है।
कमलेश का संघर्ष
शुरुआत में, 'सहमति' जैसे शब्दों से अनजान कमलेश अपनी बहू की बात पर विश्वास नहीं करती और उसे थप्पड़ मार देती है। लेकिन जैसे-जैसे वह बाहरी दुनिया और विशेषज्ञों से मिलती है, उसे 'मैरिटल रेप' (वैवाहिक बलात्कार) की भयानक सच्चाई का सामना करना पड़ता है। यहीं से कमलेश का अपने ही पालन-पोषण और आंतरिक पितृसत्ता के खिलाफ संघर्ष शुरू होता है।
परवरिश और 'टॉक्सिक मर्दानगी'
लेखक दिव्य निधि शर्मा ने बारीकी से दिखाया है कि कैसे एक मां अनजाने में अपने बेटे में श्रेष्ठता की भावना भर देती है। छोटे-छोटे फ्लैशबैक के माध्यम से अरुण के बचपन की घटनाएं दिखाई गई हैं, जहाँ उसे यह सिखाया गया कि वह विशेष है। हालांकि ये दृश्य थोड़े सीधे और कच्चे लग सकते हैं, लेकिन ये 'टॉक्सिक मस्कुलिनिटी' की जड़ों को समझने में मदद करते हैं।
दिव्या दत्ता और संजय मिश्रा का अभिनय
दिव्या दत्ता ने कमलेश के किरदार में जान डाल दी है। उनकी स्थानीय बोली और चेहरे के हाव-भाव एक मासूम लेकिन दृढ़ महिला की छवि प्रस्तुत करते हैं। वहीं, संजय मिश्रा का अभिनय भी प्रभावशाली है, जब कमलेश उनके पाखंड को चुनौती देती है।
संवाद और प्रभाव
सीरीज के संवाद इसके विषयों को और मजबूती प्रदान करते हैं। कमलेश का यह अहसास कि क्रांति हमेशा शोर-शराबे वाली नहीं होती, खूबसूरती से प्रस्तुत किया गया है: "क्रांति जंगल में शेर की तरह नहीं, रसोई में बिल्ली की तरह आती है।"
कहाँ कमी रह गई?
जहाँ सीरीज अपने विषय में मजबूत है, वहीं पूजा (बहू) के किरदार के चित्रण में यह थोड़ी कमजोर पड़ती है। पूजा को एक जागरूक युवा के रूप में दिखाया गया है, लेकिन शादी के बाद उसकी लाचारी थोड़ी विरोधाभासी लगती है। कुछ जगहों पर शो की मेकिंग भी थोड़ी कमजोर महसूस होती है।
निष्कर्ष: एक जरूरी 'कोर्स करेक्शन'
'चिरैया' भारत में वैवाहिक बलात्कार के अपराधीकरण न होने और कानून की सीमाओं पर एक कड़ा प्रहार है। तकनीकी खामियों के बावजूद, यह शो पितृसत्ता के उस चेहरे को उजागर करता है जो हमारे घरों में छिपा हुआ है। जियो-हॉटस्टार पर उपलब्ध यह श्रृंखला एक बार जरूर देखी जानी चाहिए, क्योंकि यह घर के भीतर 'मौन' रहने वाली महिलाओं को अपनी आवाज पहचानने की प्रेरणा देती है।