फिल्म 'प्रहार': उज्ज्वल निकम की कहानी में संवेदनशीलता और ईमानदारी
एक निष्पक्ष फिल्म की पहचान
आजकल, जब ऐतिहासिक तथ्यों और वास्तविक घटनाओं का उपयोग राजनीतिक नैरेटिव या प्रोपेगैंडा फिल्मों के निर्माण में किया जा रहा है, ऐसे में एक निष्पक्ष और ईमानदार फिल्म को पहचानना कठिन हो गया है। हालांकि, इस माहौल में ऐसी फिल्म बनाना निर्देशक के लिए एक बड़ी चुनौती होती है। अविनाश अरुण इस चुनौती को स्वीकार करते हैं। जब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने 'प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम' का ट्रेलर जारी किया, तो कई लोगों को आशंका थी कि यह फिल्म भी हालिया राजनीतिक फिल्मों की तरह होगी। लेकिन फिल्म देखने के बाद यह धारणा गलत साबित होती है।
प्रोपेगैंडा से बचाव और संवेदनशील निर्देशन
यह फिल्म भारत के प्रसिद्ध विशेष सरकारी वकील उज्ज्वल निकम के जीवन और 26/11 मुंबई आतंकी हमले के दोषी मोहम्मद अजमल आमिर कसाब के ऐतिहासिक मुकदमे पर आधारित है।
संतुलित दृष्टिकोण
26/11 का हमला एक दुखद राष्ट्रीय त्रासदी थी। फिल्म में कसाब और उसके सहयोगियों द्वारा 189 निर्दोष लोगों की हत्या के भयानक दृश्य को दर्शाया गया है। लेकिन निर्देशक अविनाश अरुण और निर्माता दिनेश विजान की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने इस कहानी को धार्मिक या राजनीतिक नफरत का माध्यम नहीं बनने दिया।
अदालती बहस की बारीकियां
फिल्म में निकम द्वारा कसाब के वकील अब्बास काज़मी (सिकंदर खेर द्वारा निभाया गया) के साथ तीखी बहस के दौरान 'आतंकवादी वकील' कहने जैसे वास्तविक प्रसंगों को ईमानदारी से दर्शाया गया है, जो कोर्टरूम के तनाव और रणनीति को उजागर करते हैं।
कहानी और कसाब का मुकदमा
फिल्म की शुरुआत एक अदालती दृश्य से होती है, जहाँ उज्ज्वल निकम (राजकुमार राव) 1993 के मुंबई बम धमाकों के असली मास्टरमाइंड्स-दाऊद इब्राहिम, टाइगर मेमन और पाकिस्तान की ISI- के अब तक कानून की गिरफ्त से बाहर होने पर गुस्सा व्यक्त करते हैं। इसके बाद कहानी 26 नवंबर 2008 के मुंबई हमलों और कसाब के ट्रायल पर केंद्रित हो जाती है।
दमदार अभिनय
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसकी स्टारकास्ट का शानदार अभिनय है:
राजकुमार राव (उज्ज्वल निकम): 'शाहिद' में मानवाधिकार वकील की भूमिका निभाने वाले राजकुमार राव ने इस बार एक सख्त और तेजतर्रार सरकारी वकील के रूप में बेहतरीन काम किया है।
जयदीप अहलावत (चौधरी जुल्फिकार): पाकिस्तान की फेडरल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (FIA) के पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के रूप में जयदीप अहलावत और राजकुमार राव के बीच के दृश्य फिल्म के बेहतरीन पलों में से एक हैं।
ललित प्रभाकर (अजमल कसाब): कसाब के जटिल किरदार में ललित प्रभाकर ने जान फूंक दी है। CST पर गोलीबारी के दृश्यों से लेकर जेल में पछतावे के क्षणों तक, वे दर्शकों में गुस्सा और नफरत दोनों पैदा करने में सफल रहे हैं।
ऋत्विक सहोरे (निकम के बेटे): एक असहज और संघर्षरत बेटे के रूप में ऋत्विक सहोरे ने भी अपनी बेहतरीन अभिनय क्षमता का परिचय दिया है।
फिल्म में कमी
जहाँ फिल्म CST में हुए नरसंहार की विभीषिका को पूरी क्रूरता के साथ दिखाती है, वहीं एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक पहलू छूटता नजर आता है। सहायक उप-निरीक्षक तुकाराम ओम्बले के बलिदान को फिल्म में पर्याप्त जगह नहीं मिली, जिनकी बदौलत कसाब को जिंदा पकड़ा जा सका था। यदि इस क्षण को 2 मिनट का दृश्य दिया जाता, तो फिल्म और अधिक मुकम्मल होती।
निष्कर्ष
तमाम चुनौतियों के बावजूद, अविनाश अरुण ने एक संवेदनशील और राष्ट्रीय स्मृति में दर्ज दुखद घटना पर एक ईमानदार, निष्पक्ष और परिपक्व फिल्म बनाने में सफलता प्राप्त की है। 'प्रहार' न तो बेवजह सनसनी फैलाती है और न ही सांप्रदायिक सौहार्द को नुकसान पहुंचाती है—यह एक कानूनी लड़ाई की सच्ची और कड़वी दास्तान बयां करती है।