फिल्म 'शतक': आरएसएस के इतिहास को जीवंत करती एक प्रेरणादायक कहानी
फिल्म का सारांश
भारत में कुछ कहानियाँ केवल समाचारों का हिस्सा नहीं होतीं, बल्कि वे उन लोगों की आत्मा में बसती हैं जिन्होंने उन्हें अपने खून-पसीने से सींचा है। 'शतक' उन चुनिंदा फिल्मों में से एक है जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के बारे में केवल सतही जानकारी नहीं देती, बल्कि दर्शकों को उस समय में ले जाती है जब संघ ने अपने पहले 50 वर्षों का सफर तय किया। यह फिल्म इतिहास को किताबों से निकालकर एक मानवीय रूप में प्रस्तुत करती है, दर्शकों को उस साहस, संघर्ष और निस्वार्थ सेवा से परिचित कराती है जिसने इस संगठन की नींव को मजबूत किया।
फिल्म की तकनीक और प्रस्तुति
फिल्म की शुरुआत होते ही आप इसकी सुंदरता में खो जाते हैं, जहाँ वास्तविक अभिनय और अद्भुत तकनीक का समावेश इस तरह किया गया है कि आपको अंतर का एहसास नहीं होता। खास बात यह है कि फिल्म अपनी तकनीक का प्रदर्शन नहीं करती, बल्कि इसे इस तरह से उपयोग करती है कि अतीत एकदम वास्तविक प्रतीत होता है। छोटे-छोटे मैदान, साधारण बैठकें और एक बड़े सपने की ओर बढ़ते कदम... हर चीज को इतनी बारीकी से प्रस्तुत किया गया है कि आप खुद को उसी समय में महसूस करने लगते हैं।
डॉ. केशव बलीराम हेडगेवार का चित्रण
इस कहानी का मुख्य पात्र डॉ. केशव बलीराम हेडगेवार हैं। फिल्म उन्हें किसी ऊँची मूर्ति के रूप में नहीं, बल्कि एक अनुशासित और दृढ़ व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करती है, जिनकी सेवा भावना और मजबूत चरित्र ने आरएसएस की नींव रखी। उनके प्रारंभिक संघर्ष, स्वतंत्रता संग्राम में उनके बलिदान और संगठन की साधारण शुरुआत को देखकर दिल भर आता है। यह फिल्म हमें याद दिलाती है कि कोई भी बड़ा आंदोलन शोर-शराबे से नहीं, बल्कि सच्चे विचार और अटूट लगन से शुरू होता है।
गंभीरता और गहराई
जब कहानी माधव सदाशिव गोलवलकर (गुरुजी) के समय में पहुँचती है, तो फिल्म और भी गंभीर हो जाती है। संघ पर लगे प्रतिबंधों का समय, विशेषकर महात्मा गांधी की हत्या के बाद, बहुत धैर्य के साथ दर्शाया गया है। यहाँ फिल्म का पूरा ध्यान इस बात पर है कि कैसे सूझबूझ और नैतिक साहस के साथ संगठन को पुनः स्थापित किया गया। ये दृश्य दर्शाते हैं कि उस समय चुनौतियाँ कितनी बड़ी थीं और उनसे पार पाने के लिए कितनी दृढ़ता की आवश्यकता थी।
राष्ट्र-निर्माण के क्षण
यह फिल्म भारत के राष्ट्र-निर्माण के महत्वपूर्ण क्षणों को भी छूती है। दादरा और नगर हवेली की आजादी के दृश्यों को सम्मान के साथ प्रस्तुत किया गया है, जबकि कश्मीर के घटनाक्रम यह स्पष्ट करते हैं कि कैसे संघ ने कठिन समय में मार्गदर्शन किया। ये सभी हिस्से संगठन के सफर को देश की बड़ी कहानी से जोड़ते हैं और दर्शाते हैं कि दूरदर्शिता और सेवा का जज्बा क्या होता है।
आम स्वयंसेवकों की कहानी
'शतक' की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह केवल बड़े नेताओं की कहानी नहीं, बल्कि उन आम स्वयंसेवकों की भी कहानी कहती है जो पर्दे के पीछे रहकर देश के लिए समर्पित रहे। घर छोड़ते युवा, कठिनाइयों का सामना करते उनके परिवार और चुपचाप किए गए बलिदान को फिल्म इतनी गहराई से प्रस्तुत करती है कि हर दृश्य दिल को छू जाता है। ये मानवीय भावनाएँ ही इस संगठनात्मक इतिहास को दर्शकों के लिए बेहद निकट और वास्तविक बनाती हैं।
टीम की मेहनत और निर्देशन
इस फिल्म को पर्दे पर लाने वाली पूरी टीम की मेहनत स्पष्ट है। अनिल डी. अग्रवाल की सोच, कृधन मीडियाटेक और वीर कपूर का प्रोडक्शन, और आशीष तिवारी के साथ मिलकर की गई कोशिशों ने फिल्म को एक विशेष वजन दिया है। निर्देशक आशीष मॉल ने जिस गंभीरता और सम्मान के साथ इस विषय को संभाला है, वह वास्तव में प्रशंसा के योग्य है। फिल्म में कहीं भी अनावश्यक शोर या सनसनी फैलाने की कोशिश नहीं की गई है, बल्कि कहानी को अपनी गति से बहने दिया गया है ताकि हर दृश्य अपना पूरा प्रभाव छोड़ सके।
फिल्म का संदेश
'शतक' केवल इतिहास दिखाने वाली फिल्म नहीं है, बल्कि यह उस विश्वास और अटूट जज्बे को सलाम करती है जिसने सब कुछ सहते हुए भी अपना कार्य जारी रखा। यह फिल्म आपको उन मानवीय कहानियों से परिचित कराती है जिन्होंने इस संगठन को खड़ा किया, और साथ ही देश के एक बड़े सफर के बारे में सोचने पर मजबूर कर देती है।
फिल्म का समापन
फिल्म के अंतिम दृश्यों तक पहुँचते-पहुँचते आप आरएसएस के पहले 50 वर्षों को केवल जान नहीं पाते, बल्कि उन्हें गहराई से अनुभव करने लगते हैं। यही कारण है कि फिल्म समाप्त होते ही आप इसके अगले भाग का बेसब्री से इंतजार करने लगते हैं।
फिल्म की जानकारी
डायरेक्शन: आशीष मॉल
प्रोड्यूसर: वीर कपूर
प्रोडक्शन स्टूडियो: कृधान मीडियाटेक
कॉन्सेप्ट: अनिल धनपत अग्रवाल
को-प्रोड्यूसर: आशीष तिवारी
एसोसिएट प्रोड्यूसर: अशोक प्रधान, मयंक पटेल, कबीर सदानंद
राइटर: नितिन सावंत, रोहित गहलोत, उत्सव दान
एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर: अभिनव शिव तिवारी
समय: 112 मिनट
रेटिंग: 3.5/5 स्टार्स
फिल्म का ट्रेलर