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फिल्म सहिया के सर्टिफिकेशन पर संजय शर्मा का कड़ा रुख

फिल्म 'सहिया' के सर्टिफिकेशन को लेकर निर्देशक संजय शर्मा ने सेंसर बोर्ड के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है। उन्होंने कहा कि यदि स्थिति में सुधार नहीं होता है, तो वह कानूनी कदम उठाने के लिए तैयार हैं। शर्मा ने यह भी सवाल उठाया कि छोटे बजट की फिल्मों को महीनों तक क्यों रोका जाता है और फिल्म निर्माताओं को स्पष्ट कारण क्यों नहीं बताया जाता। उनकी फिल्म नक्सलवाद का समर्थन नहीं करती, फिर भी उसे लेकर लंबी प्रक्रिया क्यों चल रही है, यह भी एक बड़ा सवाल है। अब देखना है कि सेंसर बोर्ड इस मामले पर क्या प्रतिक्रिया देता है।
 

संजय शर्मा का सेंसर बोर्ड के खिलाफ बयान

फिल्म 'सहिया' के सर्टिफिकेशन को लेकर निर्देशक और निर्माता संजय शर्मा ने सेंसर बोर्ड के प्रति अपनी नाराजगी व्यक्त की है। मुंबई में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा कि यदि सेंसर बोर्ड छोटे बजट की फिल्मों के प्रति अपना रवैया नहीं बदलता, तो वह कानूनी कार्रवाई करने से नहीं हिचकिचाएंगे। शर्मा ने कहा, “मैं निश्चित रूप से कोर्ट जाने की तैयारी कर रहा हूं। मैं कल तक इंतजार कर रहा हूं, जब पांच दिन का समय खत्म होगा। मुझे उम्मीद है कि सेंसर बोर्ड मंजूरी देगा। यदि ऐसा नहीं होता है, तो हमें हाई कोर्ट जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।”


सहिया फिल्म की स्थिति

संजय शर्मा ने 'सहिया' का निर्देशन और निर्माण किया है, और यह फिल्म काफी समय से सेंसर बोर्ड में अटकी हुई है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि फिल्मों को महीनों तक सेंसर बोर्ड में क्यों रोका जाता है और फिल्म निर्माताओं को स्पष्ट कारण क्यों नहीं बताया जाता। शर्मा ने कहा, “मैंने कई लोगों से सुना है कि उनकी फिल्में पांच या छह महीने तक रुकी रहीं। वे बार-बार सेंसर बोर्ड के पास गए, लेकिन उन्हें कोई स्पष्टता नहीं मिली।” उनके अनुसार, यह केवल उनकी फिल्म की समस्या नहीं है, बल्कि छोटे फिल्म निर्माताओं के लिए एक गंभीर मुद्दा बन चुका है।


फिल्म की कहानी और संदेश

'सहिया' में शांतनु माहेश्वरी, रिंकू राजगुरु और नीरज काबी मुख्य भूमिकाओं में हैं। यह फिल्म पुलिस और नक्सलवाद के संघर्ष की पृष्ठभूमि में बनी है, जो आम आदिवासी लोगों की कहानी को दर्शाती है, जो हिंसा और टकराव के बीच फंस जाते हैं। शर्मा ने स्पष्ट किया कि फिल्म नक्सलवाद का समर्थन नहीं करती और न ही हिंसा को बढ़ावा देती है। ऐसे में उन्हें समझ नहीं आता कि फिल्म को लेकर इतनी लंबी प्रक्रिया क्यों चल रही है।


पत्रकारिता के अनुभव का असर

प्रेस कॉन्फ्रेंस में शर्मा ने अपने पत्रकारिता के अनुभव और न्यूज़ ऑर्गनाइजेशन '4 PM' से जुड़े होने पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा, “मुझे शक है कि '4 PM' नाम मेरे खिलाफ हो सकता है। शायद कुछ लोगों को इस नाम से समस्या है। मैंने अपने पत्रकारिता करियर में कई बार परेशानियों का सामना किया है, लेकिन मैंने कभी नहीं सोचा था कि सिर्फ '4 PM' की वजह से मुझे बॉलीवुड में निशाना बनाया जाएगा।”


सेंसर बोर्ड की प्रक्रिया पर सवाल

शर्मा ने यह भी सवाल उठाया कि यदि किसी को उनसे या उनके पत्रकारिता के काम से समस्या है, तो बाकी लोगों को इसकी कीमत क्यों चुकानी चाहिए। उन्होंने कहा, “आपको मुझसे या '4 PM' से दिक्कत हो सकती है, लेकिन 100 से 200 लोगों की मेहनत को दिखाने वाली फिल्म को क्यों रोका जा रहा है? इसके पीछे क्या सोच है?” उनका यह बयान इस चिंता को दर्शाता है कि एक फिल्म केवल उसके निर्देशक की नहीं होती, बल्कि इसके पीछे काम करने वाले सैकड़ों लोगों की मेहनत भी जुड़ी होती है।


CBFC की स्क्रीनिंग प्रक्रिया पर नाराजगी

सेंसर बोर्ड की स्क्रीनिंग प्रक्रिया में फोन जमा कराने को लेकर भी शर्मा ने नाराजगी जताई। उन्होंने पूछा, “बंद दरवाज़ों के पीछे कौन सी बातें हो रही हैं कि फ़ोन बाहर छोड़ने पड़ रहे हैं? कुछ गड़बड़ तो है, है ना? यदि आपको डरने की कोई बात नहीं है, तो खुलकर बताएं। हमारे सामने बैठिए, कैमरा ऑन कीजिए, और बताइए कि फ़िल्म में क्या गलत है।” शर्मा का कहना है कि फिल्म निर्माताओं को आपत्तियों और पूरी बातचीत का रिकॉर्ड मिलना चाहिए, ताकि उन्हें पता हो कि फिल्म के किस हिस्से पर सवाल उठाया गया है और क्यों।


RTI के माध्यम से सवाल उठाने की योजना

शर्मा ने RTI के जरिए इस प्रक्रिया से जुड़े सवाल पूछने की योजना बनाई है। उन्होंने कहा, “मैं RTI के माध्यम से सवाल उठा रहा हूं: फिल्म 51 दिनों तक क्यों नहीं देखी गई? लोगों को यह क्यों नहीं बताया गया कि बोर्ड के कौन से सदस्य फिल्म देख रहे हैं?” इसके साथ ही उन्होंने प्रोड्यूसर को मिलने वाले जवाब को रिकॉर्ड पर रखने की मांग की। अब यह देखना है कि सेंसर बोर्ड इस विवाद पर क्या प्रतिक्रिया देता है और क्या 'सहिया' को सर्टिफिकेट मिलता है या मामला वास्तव में हाई कोर्ट तक पहुंचता है।