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शंकर महादेवन: संगीत की दुनिया में एक नई पहचान

शंकर महादेवन, जो 3 मार्च को जन्मे, का संगीत सफर प्रेरणादायक है। मुंबई के चेंबूर में जन्मे शंकर ने बचपन से ही संगीत में रुचि दिखाई। उन्होंने एक सुरक्षित करियर को छोड़कर संगीत को अपनाया और अपने पहले गाने 'ब्रेथलेस' से रातों रात पहचान बनाई। उनकी म्यूजिक तिकड़ी शंकर-एहसान-लॉय ने हिंदी सिनेमा में कई यादगार गीत दिए हैं। जानें उनके जीवन की कहानी और संगीत के प्रति उनके जुनून के बारे में।
 

संगीत के सुरों में बिता बचपन


मुंबई: 3 मार्च को जन्मे शंकर महादेवन का बचपन संगीत के रंगों में गुजरा। उनका जन्म मुंबई के चेंबूर में हुआ, जबकि उनके परिवार की जड़ें केरल के पलक्कड़ से जुड़ी हैं। उन्हें बचपन से ही भारतीय शास्त्रीय और कार्नाटिक संगीत का माहौल मिला। उन्होंने कम उम्र में ही शास्त्रीय संगीत की शिक्षा लेना शुरू कर दिया था। पढ़ाई के साथ-साथ संगीत उनके जीवन का सबसे बड़ा जुनून बन गया। कॉलेज के दिनों में वह हर सांस्कृतिक कार्यक्रम की जान होते थे और कई पुरस्कार भी जीते।


संगीत के प्रति जुनून

शंकर ने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद एक बड़ी कंपनी में नौकरी शुरू की थी, जहां वह अच्छी खासी सैलरी कमा रहे थे। लेकिन उनका दिल हमेशा संगीत में बसता था। अंततः उन्होंने सुरक्षित करियर को छोड़कर संगीत को पूरी तरह से अपनाने का निर्णय लिया। यह निर्णय आसान नहीं था, लेकिन इसने उनके जीवन की दिशा बदल दी।


पहला गाना: एक चुनौती

उनके करियर का असली मोड़ तब आया जब उन्हें अपने पहले एल्बम के लिए गाना रिकॉर्ड करना था। यह गाना था 'ब्रेथलेस', जिसके बोल प्रसिद्ध गीतकार जावेद अख्तर ने लिखे थे। जब शंकर ने इसकी स्क्रिप्ट देखी, तो वह चकित रह गए। चार पन्नों में बिना रुके लिखे शब्द किसी लेख की तरह लग रहे थे। उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया कि उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि इसे गाना कैसे है। पहली नजर में यह असंभव सा लगा, लेकिन उन्होंने चुनौती स्वीकार की। बिना रुके गाने की शैली में रिकॉर्ड किया गया यह गीत दर्शकों को बेहद पसंद आया।


ब्रेथलेस: सफलता की सीढ़ी

'ब्रेथलेस' रिलीज होते ही एक बड़ी हिट साबित हुआ। इस गाने ने शंकर महादेवन को रातों रात पहचान दिलाई। उन्हें स्क्रीन अवार्ड में बेस्ट नॉन फिल्म एल्बम का सम्मान भी मिला। इस प्रयोग ने उन्हें एक अलग पहचान दी और संगीत की दुनिया में उनकी मजबूत जगह बना दी।


संगीत की नई तिकड़ी

इसके बाद उन्हें फिल्मों से ऑफर मिलने लगे। असली पहचान उन्हें म्यूजिक तिकड़ी शंकर-एहसान-लॉय के सदस्य के रूप में मिली। एहसान नूरानी और लॉय मेंडोंसा के साथ मिलकर उन्होंने हिंदी सिनेमा को कई यादगार गीत दिए। फिल्म 'दिल चाहता है', 'कल हो न हो' और कई अन्य फिल्मों का संगीत आज भी लोगों के दिलों में बसा हुआ है। उनकी धुनों में शास्त्रीयता और आधुनिकता का सुंदर मेल देखने को मिलता है।