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अहोई अष्टमी 2026: जानें पूजा का सही समय और खास उपाय

अहोई अष्टमी 2026 में माताएं संतान की लंबी उम्र और सुखद जीवन की कामना के लिए विशेष पूजा करेंगी। जानें इस दिन की सही तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि। इसके साथ ही, इस पर्व से जुड़ी पौराणिक कथा भी जानें, जो दया और श्रद्धा का महत्व बताती है।
 

अहोई अष्टमी का महत्व


नई दिल्ली: हर साल माताएं संतान की लंबी उम्र, स्वास्थ्य और सुखद जीवन की कामना के लिए अहोई अष्टमी का व्रत करती हैं। इस दिन अहोई माता की पूजा के साथ-साथ शाम को तारों को अर्घ्य देने की परंपरा भी है। वर्ष 2026 में अष्टमी तिथि दो दिनों तक रहने के कारण व्रत की तिथि को लेकर कुछ संदेह उत्पन्न हो गए हैं। पूजा का सही समय भी जानना आवश्यक है। आइए, जानते हैं इस साल अहोई अष्टमी की सही तारीख, शुभ मुहूर्त और व्रत से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियाँ।


अहोई अष्टमी 2026 की तिथि और पूजा का समय

द्रिक पंचांग के अनुसार, कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 1 नवंबर 2026 को दोपहर 2 बजकर 51 मिनट पर प्रारंभ होगी और 2 नवंबर को दोपहर 1 बजकर 10 मिनट पर समाप्त होगी। अहोई अष्टमी की पूजा शाम को की जाती है, इसलिए इस व्रत को रविवार, 1 नवंबर को रखा जाएगा।


पूजा का शुभ मुहूर्त और उपाय

अहोई अष्टमी पर शाम के समय अहोई माता की पूजा करना अत्यंत शुभ माना जाता है। इस वर्ष पूजा का समय शाम 5 बजकर 35 मिनट से 6 बजकर 54 मिनट तक निर्धारित किया गया है, जो कुल 1 घंटा 19 मिनट का मुहूर्त है। इस दौरान माताएं विधिपूर्वक पूजा कर संतान की सुख-समृद्धि और लंबी उम्र की प्रार्थना कर सकती हैं। तारों के दर्शन का समय शाम लगभग 6 बजे है, जबकि चंद्रोदय रात 11 बजकर 39 मिनट पर होगा। विभिन्न शहरों में तारों के दिखने और चंद्रोदय के समय में भिन्नता हो सकती है, इसलिए स्थानीय समय की जानकारी अवश्य प्राप्त करें।


अहोई अष्टमी के विशेष कार्य

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन कुछ विशेष कार्य करना शुभ माना जाता है। अहोई माता को दूध और चावल से बनी खीर या दूध-भात का भोग अर्पित करें और पूजा के बाद प्रसाद बांटें। शाम को तारे दिखाई देने पर जल अर्पित करते हुए संतान की अच्छी सेहत की कामना करें। इसके अतिरिक्त, गाय को हरा चारा या गुड़ खिलाना भी शुभ माना जाता है। माताएं अपनी श्रद्धा के अनुसार जरूरतमंदों को अन्न, फल और कपड़ों का दान कर सकती हैं। पूजा में अहोई माता के सामने घी का दीपक जलाने की परंपरा भी है।


अहोई अष्टमी की कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, एक साहूकार के सात बेटे, सात बहुएं और एक बेटी थी। दीपावली से पहले घर की सफाई के लिए परिवार की महिलाएं जंगल में मिट्टी खोदने गईं। वहां साहूकार की बेटी से गलती से सेहू के बच्चों को चोट लग गई, जिससे उनकी मृत्यु हो गई। दुखी सेहू ने उसे श्राप दे दिया। अपनी ननद को बचाने के लिए छोटी बहू ने श्राप का असर खुद पर लेने का निर्णय लिया। इसके बाद उसके बच्चों को भी परेशानी होने लगी। एक पंडित की सलाह पर उसने गौ माता की सेवा शुरू की। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर गौ माता ने उसकी सहायता की और सेहू का श्राप समाप्त हो गया। इसके बाद छोटी बहू को फिर से संतान सुख प्राप्त हुआ। यह कथा दया, सेवा और सच्ची श्रद्धा का महत्व दर्शाती है।