अहोई अष्टमी: माताओं का विशेष पर्व और इसका महत्व
दीपावली की तैयारी और अहोई अष्टमी
दीपावली का पर्व नजदीक है, और इसकी तैयारियाँ घरों और बाजारों में जोरों पर हैं। भारतीय पंचांग के अनुसार, कार्तिक महीने की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि का विशेष महत्व है, जिस दिन अहोई माता का व्रत रखा जाता है। इस वर्ष, अहोई अष्टमी का व्रत 1 नवंबर को मनाया जाएगा। जयपुर-जोधपुर के पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान के निदेशक ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास के अनुसार, इस दिन माताएं अपने बच्चों की लंबी उम्र और स्वास्थ्य के लिए निर्जला उपवास करती हैं।
अहोई अष्टमी का व्रत
अहोई अष्टमी का व्रत माताएं कार्तिक कृष्ण अष्टमी को रखती हैं। इस वर्ष, यह तिथि 1 नवंबर को दोपहर 02:51 बजे से शुरू होकर 2 नवंबर को 01:10 बजे समाप्त होगी। इस दिन चंद्र और तारों का दर्शन किया जाएगा, जिससे व्रत का पारण किया जाएगा। यह दिन भारतीय हिंदू महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है।
व्रत का महत्व
ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि अहोई अष्टमी का व्रत संतान की खुशहाली और दीर्घायु के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इस व्रत को करने से संतान के स्वास्थ्य में सुधार होता है और घर में सुख-समृद्धि बढ़ती है। यह व्रत सूर्योदय से सूर्यास्त तक रखा जाता है और तारों को जल अर्पित करने के बाद ही खोला जाता है।
अहोई अष्टमी का शुभ मुहूर्त
अहोई अष्टमी के लिए पूजा का सर्वोत्तम समय शाम 4:59 बजे से 6:15 बजे तक रहेगा। तारों का दर्शन कर व्रत का पारण शाम 06:22 बजे से शुरू होगा। चंद्रोदय का समय रात 11:05 बजे है।
अहोई माता का महत्व
अहोई माता को मां पार्वती का रूप माना जाता है, जिन्हें संतानों की रक्षा और उनकी लंबी उम्र देने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इनकी पूजा से महिलाओं की कुंडली में ऐसे योग बनते हैं, जो संतान से जुड़ी समस्याओं को दूर करते हैं।
पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, अहोई माता का रूप साही के रूप में दर्शाया गया है। एक महिला, जो अपने पुत्रों की मां थी, गलती से साही के बच्चों को मार देती है। देवी की कृपा से उसे आशीर्वाद मिलता है कि उसकी संतान सुरक्षित रहेगी। तभी से माताएं अहोई माता की पूजा करती हैं।