गणगौर पर्व: महत्व और पूजा विधि
गणगौर पर्व का महत्व
हिंदू धर्म में गणगौर का त्योहार विशेष महत्व रखता है। यह हर साल चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। यह पर्व विवाहित महिलाओं के लिए अखंड सौभाग्य और कुंवारी कन्याओं के लिए मनचाहे वर की प्राप्ति का प्रतीक है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस कठिन व्रत को रखने से शिव और शक्ति की कृपा प्राप्त होती है।
गणगौर का धार्मिक महत्व
यह त्योहार मुख्य रूप से राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात और पश्चिम बंगाल के कुछ क्षेत्रों में मनाया जाता है। 'गण' का अर्थ भगवान शंकर और 'गौर' का अर्थ माता गौरी, यानी पार्वती है। यह पर्व शिव और शक्ति के अटूट प्रेम का प्रतीक है। मान्यता है कि देवी पार्वती ने कठिन तपस्या के बाद भगवान शिव को पति के रूप में पाया था। चैत्र नवरात्र के तीसरे दिन आने वाली यह पूजा महिलाओं के लिए विशेष होती है।
गणगौर पूजा विधि
- सबसे पहले एक वेदी पर शिव-पार्वती की मिट्टी की प्रतिमा स्थापित करें।
- माता पार्वती को सोलह श्रृंगार की सामग्री जैसे मेहंदी, चूड़ियां, सिंदूर और बिंदी अर्पित करें।
- भगवान शिव को पीले वस्त्र और अक्षत चढ़ाएं।
- नवरात्र के दौरान बोए गए जवारे इस पूजा में विशेष रूप से उपयोग किए जाते हैं।
- इसके बाद फल, मिठाई और घेवर का भोग लगाएं।
- पूजा के दौरान गणगौर व्रत की पौराणिक कथा अवश्य सुनें या पढ़ें।
- अंत में आरती करें।
- पूजा में हुई सभी गलतियों की क्षमा मांगे।
पूजन मंत्र
- ॐ उमामहेश्वराभ्यां नमः॥
- ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
- हे गौरी शंकरार्धांगी। यथा त्वं शंकर प्रिया। तथा मां कुरु कल्याणी, कान्त कान्तां सुदुर्लभाम्॥