गणेश चतुर्थी: इको-फ्रेंडली तरीके से मनाने के उपाय
गणेश चतुर्थी का महत्व
गणेश चतुर्थी का पर्व भारत के सबसे प्रिय त्योहारों में से एक है। इस दौरान ढोल-नगाड़े, भजन-कीर्तन और मोदक की महक से वातावरण भक्तिमय हो जाता है। लेकिन इस पर्व का समापन गणपति विसर्जन के साथ होता है, जहां हम अक्सर एक गंभीर गलती कर बैठते हैं। जब हम प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) और रासायनिक रंगों से बनी मूर्तियों को जलाशयों में विसर्जित करते हैं, तो हम केवल मूर्तियों का विसर्जन नहीं करते, बल्कि जल में प्रदूषण भी डालते हैं। यह प्रदूषण जल जीवों के लिए हानिकारक होता है और हमारे पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचाता है।इको-फ्रेंडली गणेश चतुर्थी मनाने के तरीके
हालांकि, अब लोग अपनी आस्था के साथ-साथ पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी को भी समझने लगे हैं। आइए जानते हैं कि इस गणेश चतुर्थी को कैसे इको-फ्रेंडली तरीके से मनाया जा सकता है।
घर पर विसर्जन करें: घर पर गणपति बप्पा का विसर्जन करना न केवल सरल है, बल्कि यह आपको मानसिक शांति भी प्रदान करता है।
मिट्टी की मूर्तियां खरीदें: सबसे पहला और महत्वपूर्ण कदम है कि आप केवल मिट्टी से बनी मूर्तियां ही खरीदें। ये मूर्तियां जल में आसानी से घुल जाती हैं और पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचातीं।
साफ पानी का उपयोग करें: एक बाल्टी, टब या बड़े मिट्टी के बर्तन में साफ पानी भरें।
पूजा विधि: जैसे आप बाहर विसर्जन के समय करते हैं, वैसे ही घर पर भी श्रद्धा से आरती, पूजा और मंत्रों का जाप करें।
मूर्ति को गलने दें: पूजा के बाद धीरे से मूर्ति को पानी में डाल दें। मिट्टी की मूर्ति को पूरी तरह गलने में कुछ घंटे लग सकते हैं, इसलिए धैर्य रखें।
पवित्र पानी का उपयोग: जब मूर्ति पूरी तरह घुल जाए, तो उस पवित्र पानी को अपने घर के गमलों या बगीचे में डाल दें। इस तरह आप बप्पा का आशीर्वाद अपने घर में सहेज सकते हैं।
सोसायटी में आर्टिफिशियल तालाब बनाएं: कई सोसाइटी मिलकर एक बड़ा टैंक या आर्टिफिशियल तालाब बनाती हैं, जहां सभी लोग मिलकर विसर्जन करते हैं। यह इको-फ्रेंडली विसर्जन का एक बेहतरीन तरीका है। इससे नदियों और झीलों को प्रदूषित होने से बचाया जा सकता है और त्योहार का सामुदायिक आनंद भी बना रहता है।
आस्था और पर्यावरण को साथ लेकर चलना ही सच्ची भक्ति है। आइए, इस गणेश चतुर्थी पर एक जिम्मेदार नागरिक होने का फर्ज निभाएं और त्योहार को सही मायनों में पवित्र बनाएं।