गुरु पूर्णिमा: गुरु की पूजा का महत्व और परंपराएं
गुरु पूर्णिमा, जो आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाई जाती है, गुरु की पूजा का विशेष दिन है। इस दिन श्रद्धा से गुरुजनों का आभार व्यक्त किया जाता है। प्राचीन समय में विद्यार्थी अपने गुरु का पूजन कर उन्हें दक्षिणा देते थे। यह दिन महाभारत के रचयिता व्यास का जन्मदिन भी है। गुरु पूर्णिमा का महत्व आज भी बना हुआ है, जहां विद्यार्थी अपने गुरु को सम्मानित करते हैं। जानें इस पर्व की परंपराएं और महत्व।
Jul 29, 2026, 10:43 IST
गुरु पूर्णिमा का महत्व
आज आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा है, जो गुरु पूजा का विशेष दिन है। यह पर्व पूरे भारत में श्रद्धा और धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन हमें अपने गुरुजनों के प्रति आभार व्यक्त करना चाहिए। प्रातः स्नान के बाद ब्राह्मणों के साथ 'गुरु परम्परा सिद्धयर्थं व्यासपूजा करिष्ये' का संकल्प लें। इसके बाद श्रीपर्गी वृक्ष की चौकी पर धौतवस्त्र बिछाकर, पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण दिशा में बारह बार रेखाएं बनाकर व्यास पीठ स्थापित करें। इसके बाद ब्रह्म, ब्रह्मा, व्यास, शुकदेव, गौडपाद, गोविन्द स्वामी और शंकराचार्य का आह्वान कर पूजा करें और अपने दीक्षा गुरु की पूजा करें।
गुरु की पूजा की परंपरा
प्राचीन समय में विद्यार्थी गुरु के आश्रम में निःशुल्क शिक्षा प्राप्त करते थे। इस दिन श्रद्धा से गुरु का पूजन कर उन्हें दक्षिणा देकर कृतार्थ होते थे। परिवार में जो भी बड़ा हो, उसे गुरु तुल्य मानना चाहिए, जैसे माता, पिता, बड़े भाई या बहन। इस दिन स्नान और पूजा के बाद उत्तम वस्त्र पहनकर गुरु को वस्त्र, फल, फूल और माला अर्पित कर उनका आशीर्वाद लेना चाहिए। गुरु का आशीर्वाद सभी के लिए कल्याणकारी होता है।
गुरु पूर्णिमा का ऐतिहासिक महत्व
कहा जाता है कि इस दिन से चार महीने तक साधु-संत एक स्थान पर रहकर ज्ञान का प्रसार करते हैं। ये चार महीने अध्ययन के लिए सबसे उपयुक्त माने जाते हैं। यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी है। वे संस्कृत के महान विद्वान थे और वेदों के सार ब्रह्मसूत्र की रचना भी इसी दिन की गई थी। व्यास ने वेदों को चार भागों में बांटा और महाभारत तथा 18 पुराणों की रचना की। इस महान गुरु के जन्मदिन पर गुरु पूर्णिमा मनाने की परंपरा है।
आधुनिक समय में गुरु पूर्णिमा
इस पर्व का महत्व आज भी बना हुआ है। पारंपरिक विद्यालयों में यह दिन गुरु को सम्मानित करने का होता है। मंदिरों में पूजा, पवित्र नदियों में स्नान, भंडारे और मेले आयोजित होते हैं। विद्यार्थियों को चाहिए कि वे अपने गुरु को वस्त्र, फल, फूल और माला अर्पित कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करें। इस दिन माता-पिता और बड़े भाई-बहन की भी पूजा का विधान है।