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जया पार्वती व्रत का समापन: विधि और महत्व

जया पार्वती व्रत का समापन 01 अगस्त को होगा। यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है, जिसे महिलाएं अखंड सुहाग और कुंवारी कन्याएं मनचाहे वर के लिए करती हैं। जानें इस व्रत की विधि, पूजा के नियम और इसके धार्मिक महत्व के बारे में।
 

जया पार्वती व्रत का महत्व

सावन का महीना शुरू हो चुका है। आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी से जया-विजया पार्वती व्रत की शुरुआत हुई थी, जो सावन कृष्ण तृतीया तक, यानी 5 दिनों तक मनाया जाता है। यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है। महिलाएं इस व्रत को अखंड सुहाग और सुखद वैवाहिक जीवन के लिए करती हैं, जबकि कुंवारी कन्याएं अपने मनपसंद वर की प्राप्ति के लिए इसे रखती हैं। इस बार, जया पार्वती व्रत का समापन 01 अगस्त को होगा।


समापन की विधि

जया पार्वती व्रत 5 दिनों तक चलने वाला एक विशेष व्रत है, जिसे मुख्य रूप से सुहागिन महिलाएं और कुंवारी कन्याएं करती हैं। व्रत के अंतिम दिन विधिपूर्वक उद्यापन और समापन करना शुभ माना जाता है।


पूजन विधि

इस दिन सुबह जल्दी स्नान करने के बाद भगवान शिव और माता पार्वती का पूजन करें। पूजा में उन्हें अक्षत, फूल, फल, धूप-दीप और नैवेद्य अर्पित करें। इसके बाद व्रत कथा का पाठ करें, क्योंकि कथा सुने बिना व्रत का फल अधूरा माना जाता है। माता पार्वती को सुहाग की सामग्री जैसे चूड़ियां, बिंदी, चुनरी, सिंदूर, मेहंदी और अन्य श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित करें।


इसके बाद आरती करें और पूजा में हुई भूलों के लिए भगवान शिव और माता पार्वती से क्षमा मांगें। अपनी श्रद्धा के अनुसार ब्राह्मण, जरूरतमंद या किसी सुहागिन को फल, वस्त्र, दक्षिणा या अन्न का दान करें। प्रसाद वितरित करें और सात्विक भोजन ग्रहण कर व्रत का पारण करें।


धार्मिक मान्यता

धार्मिक मान्यता के अनुसार, जो महिलाएं विधिपूर्वक इस व्रत का समापन करती हैं, उनका वैवाहिक जीवन सुखमय रहता है और उन्हें अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है। वहीं, अविवाहित कन्याओं को अपने मनचाहे वर की प्राप्ति होती है।