जितिया व्रत: माताओं की संतान के लिए प्रेम और समर्पण का पर्व
जितिया व्रत का महत्व
हिंदू धर्म में जितिया व्रत का विशेष स्थान है। इसे माताओं के असीम प्रेम और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। हर साल यह व्रत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है, खासकर बिहार, झारखंड और उत्तर भारत के अन्य क्षेत्रों में। माताएं इस व्रत को अपने बच्चों की लंबी उम्र, स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की कामना के लिए करती हैं.
व्रत की अवधि
यह व्रत तीन दिनों तक चलता है, जिसमें माताएं 24 घंटे से अधिक समय तक अन्न-जल का सेवन नहीं करतीं.
पर्व का कार्यक्रम
2 से 4 अक्टूबर तक चलेगा तीन दिनों का पर्व
2 अक्टूबर (नहाय-खाय): पहले दिन व्रती महिलाएं सुबह स्नान कर शुद्ध और सात्विक भोजन तैयार करती हैं। इस दिन नोनी का साग, मडुआ की रोटी, तोरी और कद्दू की सब्जी बनाने की परंपरा है.
3 अक्टूबर (मुख्य निर्जला व्रत): इस दिन व्रती महिलाएं सूर्योदय से पहले ब्रह्म मुहूर्त में ‘ओठगन’ की रस्म निभाएंगी और फिर निर्जला व्रत शुरू करेंगी.
4 अक्टूबर (पारण): अष्टमी तिथि खत्म होने के बाद व्रत खोला जाएगा और महिलाएं भोजन करेंगी.
शुभ मुहूर्त और पूजा का समय
- पंचांग के अनुसार, अष्टमी तिथि 3 अक्टूबर की सुबह 7:59 बजे शुरू होगी और 4 अक्टूबर की सुबह 5:51 बजे समाप्त होगी.
- 3 अक्टूबर को सुबह 11:46 बजे से 12:34 बजे तक व्रत का संकल्प लेना शुभ है.
- मुख्य पूजा 3 अक्टूबर को शाम 6:05 बजे से रात 8:29 बजे तक की जाएगी.
- 4 अक्टूबर को सुबह 6:15 बजे से 7:27 बजे के बीच व्रत का पारण करना शुभ है.
पूजा सामग्री और विधि
पूजा के लिए आवश्यक सामग्री में भगवान जीमूतवाहन की प्रतिमा, फूल, सिंदूर, गंगाजल, मिट्टी का दीपक, अगरबत्ती, पारंपरिक पकवान, और अन्य सामग्रियां शामिल हैं.
व्रत के नियम
माताएं कथा सुनने के बाद लाल-पीला जिउतिया धागा पहनती हैं। पारण के दिन सात्विक आहार ग्रहण करना आवश्यक है.
जीमूतवाहन की कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जीमूतवाहन ने एक वृद्धा की मदद की थी, जिसके कारण उनकी पूजा का विधान बना.
चील और सियारिन की कथा
इस कथा के अनुसार, चील और सियारिन ने व्रत रखा, लेकिन सियारिन ने नियम तोड़ दिया, जिससे उसे दंड मिला.
जितिया व्रत आरती
ओम जय कश्यप नन्दन, प्रभु जय अदिति नन्दन।
त्रिभुवन तिमिर निकंदन, भक्त हृदय चन्दन॥