जीवित्पुत्रिका व्रत: तिथि, पूजा विधि और महत्व
जीवित्पुत्रिका व्रत का महत्व
आज, 03 अक्टूबर को जीवित्पुत्रिका व्रत मनाया जा रहा है, जिसे जितिया भी कहा जाता है। यह व्रत संतान की दीर्घायु, स्वास्थ्य और सुखमय जीवन की कामना के लिए किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माताएं इस दिन निर्जला व्रत रखती हैं और भगवान जीमूतवाहन की पूजा करती हैं। यह व्रत विशेष रूप से बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और आस-पास के क्षेत्रों में श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। आइए, जानते हैं इस व्रत की तिथि, मुहूर्त, पूजा विधि और इसके महत्व के बारे में।
तिथि और मुहूर्त
जितिया व्रत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष, 03 अक्टूबर को सुबह 07:59 बजे अष्टमी तिथि आरंभ हुई है, जो 04 अक्टूबर को सुबह 05:51 बजे समाप्त होगी। इस प्रकार, उदयातिथि और प्रदोष काल के अनुसार, 03 अक्टूबर को जितिया व्रत का आयोजन किया जा रहा है।
इससे पहले, 02 अक्टूबर को नहाय-खाय की परंपरा का पालन किया गया। आज माताएं निर्जल व्रत रखेंगी और भगवान जीमूतवाहन की पूजा करेंगी। व्रत का पारण 04 अक्टूबर को किया जाएगा।
पूजा का शुभ समय और विधि
इस व्रत में भगवान जीमूतवाहन की पूजा शाम के प्रदोष काल में की जाती है। आज शाम लगभग 06:05 से 08:29 बजे तक पूजा का शुभ मुहूर्त है। इस दौरान महिलाएं अपने घर के आंगन में एक छोटा पोखर बनाकर उसमें जीमूतवाहन की पूजा करती हैं। इसके बाद, जितिया व्रत कथा का पाठ किया जाता है और आरती की जाती है।
भगवान जीमूतवाहन की पूजा का महत्व
जितिया व्रत में राजा जीमूतवाहन की कथा सुनने का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जीमूतवाहन ने नागवंश की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान देने का संकल्प लिया था। उनकी करुणा और त्याग की यह कथा जितिया व्रत की धार्मिक परंपरा से जुड़ी हुई है। इस अवसर पर महिलाएं पूजा और कथा करती हैं, साथ ही अपनी संतान की लंबी उम्र और सुखी जीवन की कामना करती हैं।