दिल्ली के अक्षरधाम मंदिर में नीलकंठ वर्णी की भव्य 108 फीट ऊंची प्रतिमा का प्रतिष्ठा महोत्सव
दिल्ली में ऐतिहासिक प्रतिष्ठा महोत्सव
दिल्ली: स्वामीनारायण अक्षरधाम मंदिर ने गुरुवार को एक महत्वपूर्ण घटना का साक्षी बना, जब नीलकंठ वर्णी की 108 फीट ऊंची भव्य प्रतिमा का प्रतिष्ठा महोत्सव आयोजित किया गया।
इस समारोह में महंत स्वामी महाराज ने वैदिक विधियों से 108 फीट ऊंची प्रतिमा की प्रतिष्ठा की। इस अवसर पर भारत और अन्य देशों से लगभग 300 संतों ने अपनी उपस्थिति से इस कार्यक्रम को पवित्र बनाया।
यह प्रतिमा भगवान स्वामीनारायण के बाल तपस्वी स्वरूप का प्रतीक है, जिसमें नीलकंठ वर्णी को ध्यानमग्न मुद्रा में दर्शाया गया है। यह मूर्ति चार मास तक निर्जल और निरन्न रहकर किए गए तप का प्रतिनिधित्व करती है। महंत स्वामी महाराज के मार्गदर्शन में यह प्रतिष्ठा महोत्सव सम्पन्न हुआ, जिसमें विश्वभर से आए हजारों श्रद्धालुओं ने भाग लिया।
सुबह से ही श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या अक्षरधाम परिसर में एकत्रित होने लगी। पुरुष, महिलाएं और बच्चे पारंपरिक वेशभूषा में श्रद्धा और उत्साह के साथ उपस्थित हुए। परिसर भजनों और सामूहिक प्रार्थनाओं से गूंज उठा।
प्रतिष्ठा के बाद महंत स्वामी महाराज ने कहा कि यह मूर्ति सबसे सुंदर है और यह विश्व में शांति का संदेश फैलाएगी। जो भी यहां नीलकंठ वर्णी के दर्शन करेगा, वह सद्गुणों की प्रेरणा प्राप्त करेगा।
श्रद्धालु भक्त इस दिव्य अनुष्ठान के साक्षी बने। मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा से एक दिन पहले वैश्विक शांति यज्ञ का आयोजन हुआ, जिसमें हजारों श्रद्धालुओं ने भाग लिया। श्वेत कबूतरों को उड़ाकर शांति की प्रार्थना की गई।
अक्षरधाम मंदिर की प्रवक्ता दिशा वाघेला ने बताया कि यह मूर्ति एक पैर पर स्थित विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा है, जो 108 फीट ऊंची है। यह श्रद्धा, संयम और आध्यात्मिक साधना का प्रतीक है।
भगवान श्री स्वामिनारायण ने 11 वर्ष की आयु में गृह त्याग कर 7 वर्षों तक भारत में लोक कल्याण के लिए यात्रा की थी। इस यात्रा में उन्होंने विभिन्न तीर्थ स्थलों का दौरा किया और 'नीलकंठ वर्णी' नाम धारण किया।
प्रतिमा की विशेषताएं
- यह प्रतिमा 108 फीट ऊंची है और इसे 8 फीट ऊंचे पृष्ठतल पर स्थापित किया गया है।
- इसका निर्माण लगभग एक वर्ष में हुआ और इसे पंचधातु से बनाया गया है।
- इसमें अक्षरधाम के शिल्पी संतों और लगभग पचास कारीगरों का योगदान है।
- यह मूर्ति भगवान श्री स्वामिनारायण की तपस्या का प्रतीक है।
- इसका उद्देश्य वैश्विक मूल्यों जैसे तप, त्याग, और मानव सेवा को फैलाना है।