दिवाली पर खील-बताशों का महत्व: जानें कैसे बांटें प्रसाद
दिवाली पर खील-बताशों की पूजा का महत्व
नई दिल्ली: दिवाली के अवसर पर मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा में खील और बताशों का विशेष स्थान होता है। ये प्रसाद के दाने पूजा की थाली की पहचान बनते हैं। आरती के बाद, कई लोग इन्हें परिवार के सदस्यों में बांटते हैं, जबकि कुछ लोग बचे हुए खील-बताशों को नदी में प्रवाहित कर देते हैं या पेड़ के नीचे रख आते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, पूजा के बाद खील-बताशों को पांच हिस्सों में बांटना शुभ माना जाता है। आइए, इस परंपरा से जुड़ी मान्यताओं और प्रसाद बांटने के तरीकों के बारे में जानते हैं।
खील और बताशे: समृद्धि के प्रतीक
दिवाली की रात लक्ष्मी-गणेश पूजन में खील और बताशे चढ़ाने की परंपरा विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। खील धान से बनती है, इसलिए इसे नई फसल और अन्न की समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। वहीं, बताशे मिठास और खुशहाली का प्रतीक होते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां लक्ष्मी को खील-बताशों का भोग लगाने से घर में सुख-समृद्धि और धन-धान्य बना रहता है। यही कारण है कि दिवाली की पूजा सामग्री में इनका विशेष स्थान है।
खील-बताशे को पांच हिस्सों में बांटने की परंपरा
पूजा के बाद पांच हिस्सों में बांटें खील-बताशे
एक प्रचलित धार्मिक मान्यता के अनुसार, दिवाली की पूजा के बाद खील-बताशों को पांच हिस्सों में बांटना चाहिए। इसका उद्देश्य अन्न का सम्मान करना और उसे दूसरों के साथ साझा करना है। पहले हिस्से को गाय के लिए, दूसरे को किसी गरीब या जरूरतमंद व्यक्ति के लिए, तीसरे को पक्षियों के लिए, चौथे को पीपल के पेड़ के लिए और पांचवे हिस्से को परिवार के सदस्यों के लिए रखा जाता है।
प्रसाद का वितरण: गाय, जरूरतमंद और पक्षियों के लिए
मान्यता के अनुसार, खील-बताशों का एक हिस्सा गाय को खिलाना चाहिए। इसके लिए साफ और ताजा सामग्री का उपयोग करें। दूसरा हिस्सा किसी गरीब या जरूरतमंद व्यक्ति को दिया जा सकता है। धार्मिक परंपराओं में भूखे को भोजन कराना पुण्य का कार्य माना जाता है। दिवाली जैसे त्योहार पर प्रसाद बांटने से खुशियां दूसरों तक भी पहुंचती हैं। जरूरतमंद व्यक्ति को प्रसाद देते समय सम्मान और संवेदनशीलता का ध्यान रखना चाहिए।
पक्षियों और पीपल के लिए प्रसाद
पक्षियों और पीपल के लिए भी रखें प्रसाद
इस परंपरा में तीसरा हिस्सा पक्षियों के लिए रखा जाता है। इसे किसी साफ और सुरक्षित जगह पर रखा जा सकता है, जहां पक्षी आसानी से पहुंच सकें। चौथा हिस्सा पीपल के पेड़ के लिए निर्धारित किया जाता है। कई लोग खील-बताशे पीपल के नीचे अर्पित करते हैं। हालांकि, प्रसाद को पेड़ की जड़ों में इस तरह नहीं डालना चाहिए, जिससे गंदगी या कीड़े लगने की समस्या हो। प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति सम्मान बनाए रखना भी इस परंपरा का अहम भाव है।
परिवार के सदस्यों में बचा हुआ प्रसाद बांटें
परिवार के सदस्यों में बांटें बचा हुआ प्रसाद
पांचवां हिस्सा घर के सदस्यों के लिए रखा जाता है। गाय, जरूरतमंद, पक्षियों और पीपल के लिए हिस्सा निकालने के बाद बची हुई खील-बताशे परिवार के लोग प्रसाद के रूप में ग्रहण कर सकते हैं। इसे रिश्तेदारों और परिचितों में भी बांटा जा सकता है। कई जगह दिवाली के अगले दिन प्रसाद बांटने की परंपरा भी है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, प्रसाद का सम्मान करना और अन्न की बर्बादी से बचना महत्वपूर्ण है। इसलिए खील-बताशों को बिना वजह नदी में बहाने या खुले में छोड़कर बर्बाद करने से बचना चाहिए।