देवशयनी एकादशी: चार मास का आरंभ और विशेष व्रत विधि
देवशयनी एकादशी, जो आषाढ़ के शुक्ल पक्ष की एकादशी है, भगवान विष्णु के चार मास के विश्राम का आरंभ करती है। इस दिन उपवास और विशेष पूजा विधियों का पालन किया जाता है। जानें इस दिन क्या त्यागना और ग्रहण करना चाहिए, और कैसे एकादशी का व्रत करने से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
Jul 25, 2026, 10:34 IST
देवशयनी एकादशी का महत्व
आषाढ़ के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। कुछ स्थानों पर इसे पद्मनाभा भी कहा जाता है। इस दिन से चौमासे की शुरुआत होती है, जब भगवान श्री हरि विष्णु क्षीर सागर में विश्राम करते हैं। इस दिन उपवास करके भक्तों को श्री हरि विष्णु की सोने, चांदी, तांबा या पीतल की मूर्ति बनवाकर उसका षोडशोपचार से पूजन करना चाहिए और उसे सफेद चादर से ढककर गद्दे और तकिये वाले पलंग पर शयन कराना चाहिए।
चार मास का निवास
पुराणों के अनुसार, भगवान विष्णु इस दिन से चार महीने तक पाताल में राजा बलि के पास निवास करते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी को लौटते हैं। इस अवधि में सभी मांगलिक कार्यों पर रोक लग जाती है। इस समय भक्तों को अपनी इच्छाओं के अनुसार नित्य व्यवहार के पदार्थों का त्याग और ग्रहण करना चाहिए।
त्याग और ग्रहण
इस दिन त्याग करें
मधुर स्वर के लिए गुड़, दीर्घायु के लिए तेल, शत्रु नाश के लिए कड़वे तेल, सौभाग्य के लिए मीठे तेल और स्वर्ग प्राप्ति के लिए पुष्पादि भोगों का त्याग करें।
इस दिन ग्रहण करें
देह शुद्धि के लिए पंचगव्य, वंश वृद्धि के लिए नियमित दूध, और पुण्य फल प्राप्ति के लिए उपवास का व्रत ग्रहण करें। चतुर्मासीय व्रतों में कुछ वर्जनाएं हैं, जैसे पलंग पर सोना, झूठ बोलना, मांस और अन्य वर्जित खाद्य पदार्थों का सेवन करना।
देवशयनी एकादशी की कथा
व्रत कथा
एक बार देवऋषि नारद ने ब्रह्माजी से इस एकादशी के बारे में जानने की इच्छा व्यक्त की। ब्रह्माजी ने बताया कि सतयुग में मान्धाता नामक सम्राट के राज्य में सुख-शांति थी, लेकिन अचानक भयंकर अकाल पड़ा। राजा ने ऋषि अंगिरा से उपाय पूछा, जिन्होंने आषाढ़ माह की एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। राजा ने व्रत किया और उसके प्रभाव से राज्य में वर्षा हुई, जिससे अकाल समाप्त हुआ और समृद्धि लौट आई।