मकर संक्रांति: सूर्य के उत्तरायण का पर्व और इसका महत्व
मकर संक्रांति का महत्व
मकर संक्रांति का महत्व सूर्य के उत्तरायण से जुड़ा हुआ है। शीतकाल के अंत में सूर्य मकर रेखा को पार करते हुए उत्तर दिशा की ओर बढ़ता है, जिसे उत्तरायण कहा जाता है। यह पर्व वास्तव में सूर्य के उत्तरायण होने और मकर राशि में प्रवेश करने का शुभ अवसर है। इसे देवताओं के दिन के रूप में मनाया जाता है, जो देवयान की शुरुआत और शीत ऋतु के अंत का प्रतीक है।
सौर मास के अनुसार मकर संक्रांति
भारत उत्तरी गोलार्द्ध में स्थित है, और यहाँ के अधिकांश पर्व चंद्रमा की गति पर आधारित होते हैं। लेकिन मकर संक्रांति एक ऐसा पर्व है, जो सूर्य की गति के अनुसार सौर मास में मनाया जाता है। सूर्य वर्ष भर बारह राशियों में भ्रमण करता है, और मकर राशि में प्रवेश करने की खुशी में यह पर्व मनाया जाता है। यह शीत ऋतु के समाप्त होने और वसंत ऋतु के आरंभ का संकेत है।
मकर संक्रांति का धार्मिक महत्व
इस पर्व पर सूर्य की पूजा, स्नान और दान का विशेष महत्व होता है। यह पर्व सामाजिक सद्भाव और रबी की नई फसल के आगमन का प्रतीक है। किसान इस समय परमात्मा के प्रति आभार व्यक्त करते हैं और कृपा बनाए रखने की प्रार्थना करते हैं।
मकर संक्रांति की तिथि
मकर संक्रांति की तिथि सूर्य के मकर राशि में प्रवेश पर आधारित होती है। सामान्यतः यह 14 जनवरी को होती है, लेकिन कुछ वर्षों में यह 15 जनवरी को भी मनाई जाती है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, सूर्य का धनु से मकर राशि में प्रवेश हर वर्ष लगभग 20 मिनट देर से होता है।
पौराणिक मान्यताएँ
पौराणिक कथाओं के अनुसार, मकर संक्रांति देवी मानी जाती है। इस दिन सूर्य अपने पुत्र शनि देव से मिलने मकर राशि में प्रवेश करते हैं, जिससे पिता-पुत्र का संबंध मधुर होता है। यह पर्व मेल-मिलाप और पारिवारिक सौहार्द का प्रतीक है।
मकर संक्रांति का सांस्कृतिक महत्व
मकर संक्रांति का पर्व भारत के विभिन्न हिस्सों में विभिन्न नामों से मनाया जाता है। तमिलनाडु में इसे पोंगल, गुजरात में उत्तरायण, और उत्तर प्रदेश में खिचड़ी पर्व के रूप में जाना जाता है। यह पर्व भारतीय संस्कृति की एकता और विविधता का प्रतीक है।