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मोहिनी एकादशी: महत्व और पौराणिक कथा

मोहिनी एकादशी का व्रत हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से पापों से मुक्ति और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। जानें इस व्रत की पौराणिक कथा और मंत्र, जो आपके जीवन में सकारात्मकता लाने में मदद कर सकते हैं।
 

मोहिनी एकादशी का महत्व

हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष स्थान है। साल में 24 एकादशी तिथियाँ आती हैं, जिनमें से हर महीने दो होती हैं। इस वर्ष अधिक मास के चलते 26 एकादशी तिथियाँ मनाई जाएंगी। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है। आज, 27 अप्रैल को मोहिनी एकादशी का व्रत रखा जाएगा। इस दिन विधिपूर्वक पूजा करने से पापों से मुक्ति और घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने से साधक को सभी पापों से छुटकारा मिलता है। यदि आप भी श्री विष्णु जी का आशीर्वाद पाना चाहते हैं, तो मोहिनी एकादशी के दिन कथा का पाठ अवश्य करें।


मोहिनी एकादशी की पौराणिक कथा

एक प्राचीन कथा के अनुसार, सरस्वती नदी के किनारे भद्रावती नामक नगर था, जहाँ धृतिमान नामक राजा शासन करता था। इस नगर में धनपाल नामक एक धनी वैश्य रहता था, जो भगवान विष्णु का भक्त और परोपकारी था। उसके पांच पुत्र थे, जिनमें सबसे छोटा धृष्टबुद्धि नामक पापी था, जो जुआ खेलता था और अपने पिता की संपत्ति को बर्बाद करता था। परेशान होकर पिता ने उसे घर से निकाल दिया, जिसके बाद वह दर-दर भटकने लगा और चोरी करने लगा। अंततः राजा ने उसे कारागार में डाल दिया और बाद में नगर से बाहर निकाल दिया।


ऋषि कौण्डिन्य का मार्गदर्शन

एक दिन, जंगल में भटकते हुए वह कौण्डिन्य ऋषि के आश्रम पहुँचा। उसने ऋषि से अपने पापों से मुक्ति का उपाय पूछा। ऋषि ने उसे वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की मोहिनी एकादशी का व्रत करने की सलाह दी, यह कहते हुए कि इस व्रत से जन्म-जन्मांतर के सभी पाप समाप्त हो जाते हैं।


व्रत का फल

उसने विधिपूर्वक मोहिनी एकादशी का व्रत किया, जिसके फलस्वरूप उसे सभी पापों से मुक्ति मिली और वह भगवान विष्णु के लोक 'वैकुण्ठ' को प्राप्त हुआ।


भगवान विष्णु के मंत्र

- ॐ बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु।


यद्दीदयच्दवस ऋतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्।


- वृंदा, वृन्दावनी, विश्वपुजिता, विश्वपावनी।


पुष्पसारा, नंदिनी च तुलसी, कृष्णजीवनी।


एत नाम अष्टकं चैव स्त्रोत्र नामार्थ संयुतम।


य:पठेत तां सम्पूज्य सोभवमेघ फलं लभेत।


- ॐ वासुदेवाय विघ्माहे वैधयाराजाया धीमहि तन्नो धन्वन्तरी प्रचोदयात्।


ॐ तत्पुरुषाय विद्‍महे अमृता कलसा हस्थाया धीमहि तन्नो धन्वन्तरी प्रचोदयात्।