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राधा अष्टमी व्रत: महत्व और विधि

राधा अष्टमी व्रत का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है, जो भाद्रपद माह की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन राधा रानी की पूजा और साधना से जीवन में सुखों की प्राप्ति होती है। जानें इस व्रत की विधि, कब मनाया जाएगा और दान का महत्व क्या है।
 

राधा अष्टमी का महत्व

हिंदू धर्म में राधा अष्टमी का व्रत अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को श्री राधा रानी का जन्म हुआ था। इसलिए, हर साल इस दिन को राधा अष्टमी के रूप में मनाया जाता है।


पूजा और साधना

इस दिन राधा रानी की विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन किया जाता है। साथ ही, किशोरी जी का श्रृंगार भी किया जाता है। मान्यता है कि राधा अष्टमी के दिन राधा रानी की साधना करने से साधक को जीवन में सभी सुखों की प्राप्ति होती है और लाड़ली जू की कृपा प्राप्त होती है।


व्रत की विधि

संत प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार, राधा अष्टमी का व्रत प्रेम प्राप्ति का व्रत है। इस दिन प्रात:काल कुछ भी नहीं खाना चाहिए, क्योंकि राधा रानी प्रकट होती हैं। इसके बाद विधिपूर्वक राधा रानी का अभिषेक और श्रृंगार करके पूजा-अर्चना करनी चाहिए। फिर उनका चरणामृत लेना चाहिए। उन्होंने बताया कि इसके बाद कोई विशेष नियम नहीं हैं, केवल श्रीजी का ध्यान करना और लाड़ली जू का कीर्तन करना आवश्यक है।


राधा अष्टमी की तिथि

कब मनाया जाएगा राधा अष्टमी व्रत?
हिंदू पंचांग के अनुसार, भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि 18 सितंबर को दोपहर 1:00 बजे शुरू होगी और 19 सितंबर को दोपहर 03:26 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि के अनुसार, 19 सितंबर को राधा अष्टमी का व्रत किया जाएगा।


दान का महत्व

दान का महत्व
इस दिन दान का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, राधा अष्टमी पर दान करने से सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है और धन लाभ के योग बनते हैं। इस दिन सुबह स्नान के बाद सच्चे मन से किशोरी जी की पूजा करनी चाहिए और फिर मंदिर में या जरूरतमंदों को अन्न, धन आदि का दान करना चाहिए। ऐसा करने से राधा रानी की कृपा साधक पर बरसती है।