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लोहड़ी: प्रकृति और परंपरा का उत्सव

लोहड़ी पर्व भारतीय संस्कृति का एक उल्लासपूर्ण त्योहार है, जो विशेष रूप से किसानों के लिए महत्वपूर्ण है। यह जनवरी के दूसरे सप्ताह में मनाया जाता है, जब रबी की फसल तैयार होती है। लोहड़ी का उत्सव पूरे उत्तर भारत में मनाया जाता है, जिसमें अग्नि की पूजा, लोकगीत, और पारंपरिक व्यंजन शामिल होते हैं। यह पर्व न केवल खुशी का प्रतीक है, बल्कि इसका धार्मिक और सामाजिक महत्व भी है। दुल्ला भट्टी की परंपरा और सामूहिक उल्लास इस त्योहार को और भी खास बनाते हैं।
 

लोहड़ी पर्व का महत्व

लोहड़ी एक ऐसा उत्सव है जो भारतीय संस्कृति में उल्लास और खुशी का प्रतीक है। यह त्योहार हर साल जनवरी के दूसरे सप्ताह में मनाया जाता है और खासकर किसानों के लिए महत्वपूर्ण है। यह वह समय है जब रबी की फसल, विशेषकर गेहूं, तैयार होने लगती है। महीनों की मेहनत और उम्मीद के बाद, खेतों में लहलहाती बालियां किसानों के मन में संतोष और खुशी भर देती हैं। इसी खुशी के प्रतीक के रूप में लोहड़ी मनाई जाती है, जिसमें नई फसल की बालियों से अग्नि की पूजा कर प्रकृति और ईश्वर के प्रति आभार व्यक्त किया जाता है।


लोहड़ी का सामूहिक उत्सव

लोहड़ी केवल एक विशेष समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे उत्तर भारत, विशेषकर पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। यह पर्व मकर संक्रांति से एक दिन पहले आता है और लोगों के जीवन में नई ऊर्जा का संचार करता है। ठंड के मौसम में अलाव की गर्माहट, ढोल की थाप और लोकगीतों की गूंज वातावरण को जीवंत बना देती है। लोग नाचते-गाते हुए अपने सुख और संतोष को खुलकर व्यक्त करते हैं।


पंजाब में लोहड़ी का उत्सव

पंजाब में लोहड़ी का उत्सव विशेष रूप से जीवंत होता है। सूर्यास्त के समय, खुले स्थानों में लोहड़ी जलाने की परंपरा होती है। परिवार और पड़ोसी अग्नि के चारों ओर इकट्ठा होते हैं और तिल, गुड़, चावल और भुने हुए मक्के की आहुति देते हैं, जिसे ‘तिलचौली’ कहा जाता है। लोग अग्नि में तिल डालते हुए धन-धान्य और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। यहाँ अग्नि केवल ताप का स्रोत नहीं, बल्कि जीवन की निरंतरता और पवित्रता का प्रतीक बन जाती है।


दिल्ली और हरियाणा में लोहड़ी

दिल्ली और हरियाणा में भी लोहड़ी का उत्सव उल्लास और मस्ती के साथ मनाया जाता है। यहाँ सामूहिक आयोजनों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की धूम रहती है। पंजाबी गीतों और लोकसंगीत की मांग इस दिन चरम पर होती है। लोकप्रिय गायक और ढोल वादक अपनी प्रस्तुतियों से लोगों को झूमने पर मजबूर कर देते हैं। मूंगफली, रेवड़ी, गजक और पॉपकॉर्न का वितरण खुशियों को बांटने का माध्यम बन जाता है।


लोहड़ी का धार्मिक और सामाजिक महत्व

लोहड़ी केवल एक उत्सव नहीं है, बल्कि इसका धार्मिक और सामाजिक महत्व भी है। इस दिन गुरुद्वारों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है। लोग सुख-शांति की कामना करते हैं। जिन घरों में विवाह या नवजात शिशु का जन्म हुआ हो, वहाँ लोहड़ी का उत्सव विशेष रूप से मनाया जाता है। लोग एकत्र होकर लोहड़ी जलाते हैं और नए जीवन या रिश्ते के लिए शुभकामनाएँ देते हैं।


दुल्ला भट्टी की परंपरा

लोहड़ी से जुड़ी लोकपरंपराओं में दुल्ला भट्टी का विशेष स्थान है। महिलाएँ और बच्चे घर-घर जाकर लोकगीत गाते हुए लोहड़ी मांगते हैं और दुल्ला भट्टी की वीरता का गुणगान करते हैं। लोककथाओं के अनुसार, दुल्ला भट्टी ने गरीब हिंदू लड़कियों को गुलामी से बचाकर उनके विवाह कराए थे। यह परंपरा लोहड़ी को केवल उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक मूल्यों से जोड़ देती है।


गाँवों में लोहड़ी का दृश्य

गाँवों में लोहड़ी का दृश्य मनमोहक होता है। पारंपरिक वेशभूषा में सजे लोग ढोल की थाप पर भांगड़ा और गिद्धा करते हैं। महिलाएँ इस अवसर पर मेहंदी रचाती हैं, जो उत्सव की रंगीनता को बढ़ा देती है। घरों में मक्के की रोटी और सरसों के साग जैसे पारंपरिक व्यंजन बनते हैं, जो इस पर्व के स्वाद को खास बनाते हैं।


लोहड़ी का सार

कुल मिलाकर, लोहड़ी पर्व प्रकृति, परिश्रम और परंपरा का संगम है। यह पर्व सिखाता है कि सामूहिक उल्लास, आपसी प्रेम और कृतज्ञता से जीवन में सच्ची खुशहाली आती है। अलाव की लौ की तरह यह त्योहार भी लोगों के दिलों में गर्मजोशी, आशा और एकता का प्रकाश फैलाता है।