वट सावित्री व्रत: बांस के पंखे खरीदने की परंपरा का महत्व
वट सावित्री व्रत का पौराणिक महत्व
जानें इसके पीछे का पौराणिक कारण
हर वर्ष ज्येष्ठ अमावस्या को वट सावित्री का व्रत मनाया जाता है। इस दिन शनि जयंती भी होती है। इस साल यह व्रत 16 तारीख को मनाया जाएगा। वट सावित्री का व्रत मुख्य रूप से सुहागिन महिलाएं करती हैं, जो इस दिन बरगद के पेड़ की पूजा भी करती हैं। यह व्रत सावित्री और सत्यवान की कथा से जुड़ा हुआ है, जिसमें सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस लाए थे।
कथा के अनुसार, सावित्री ने बरगद के पेड़ के नीचे कठोर तप किया, जिससे यमराज सत्यवान के प्राण लौटाने के लिए मजबूर हो गए। इस व्रत को रखने से पति की आयु लंबी और वैवाहिक जीवन सुखमय होता है। इसलिए सुहागिन महिलाएं इसे बड़े श्रद्धा से करती हैं।
वट सावित्री व्रत के अवसर पर बिहार, उत्तर प्रदेश और राजस्थान की महिलाएं बांस से बने दो पंखे खरीदती हैं। आइए जानते हैं इसके पीछे का धार्मिक और पौराणिक महत्व क्या है?
बांस के पंखे की खरीद का कारण
क्यों खरीदा जाता है बांस का पंखा?
पौराणिक कथा के अनुसार, जब सावित्री ने देखा कि उनके पति सत्यवान का शरीर निडाल हो गया है, तो उन्होंने ज्येष्ठ माह की गर्मी के कारण बांस के पंखे से उन्हें हवा दी।
यह परंपरा आज भी जीवित है, और महिलाएं पूजा के समय बरगद के पेड़ और यमराज को पंखा करती हैं। पूजा के बाद, ये पंखे ब्राह्मणों को दान किए जाते हैं। ऐसा करने से वैवाहिक जीवन सुखमय होने की मान्यता है।
व्यवहारिक महत्व
ये है व्यवाहरिक वजह
हिंदू धर्म में बांस को वंश वृद्धि का प्रतीक माना जाता है। वट सावित्री व्रत के दिन महिलाएं विशेष रूप से बांस के पंखे का उपयोग करती हैं। ज्येष्ठ माह में गर्मी अधिक होती है, और पुराने समय में बिजली की कमी के कारण लोग हाथ के पंखे का उपयोग करते थे।
इसलिए, वट सावित्री की पूजा में बांस का पंखा शामिल किया जाता है। पंखा खरीदना और उससे हवा करना पति के प्रति समर्पण, प्रेम और सेवा भाव को दर्शाता है।