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विश्वकर्मा पूजा: कन्या संक्रांति पर जानें शुभ मुहूर्त और विधि

कन्या संक्रांति पर भगवान विश्वकर्मा की पूजा का महत्व और विधि जानें। इस वर्ष पूजा 17 सितंबर को होगी, जब सूर्य देव कन्या राशि में प्रवेश करेंगे। जानें शुभ मुहूर्त और आवश्यक सामग्री के बारे में।
 

विश्वकर्मा पूजा का महत्व

नई दिल्ली: हिंदू पंचांग के अनुसार, हर वर्ष कन्या संक्रांति के अवसर पर देव शिल्पी भगवान विश्वकर्मा की पूजा का आयोजन किया जाता है। भगवान विश्वकर्मा को सृष्टि के पहले इंजीनियर और दिव्य वास्तुकार के रूप में पूजा जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, उन्होंने स्वर्ग लोक, सोने की लंका, भगवान श्रीकृष्ण की द्वारका नगरी और देवताओं के अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण किया। इस दिन कारखानों, दुकानों और कार्यस्थलों पर मशीनों, वाहनों और औजारों की विधिपूर्वक पूजा की जाती है, जिससे व्यापार में वृद्धि होती है और तकनीकी समस्याएं हल होती हैं।


कब मनाया जाएगा विश्वकर्मा जयंती?

ज्योतिषीय गणना के अनुसार, विश्वकर्मा पूजा का पर्व सूर्य देव के सिंह राशि से कन्या राशि में गोचर के दिन मनाया जाता है। इस वर्ष सूर्य देव 17 सितंबर को सुबह 04:28 बजे कन्या राशि में प्रवेश करेंगे। चूंकि संक्रांति का क्षण 17 सितंबर की सुबह ब्रह्म मुहूर्त से पहले आ रहा है, इसलिए विश्वकर्मा पूजा का महापर्व 17 सितंबर को पूरे देश में श्रद्धा के साथ मनाया जाएगा।


पूजन के लिए शुभ मुहूर्त

17 सितंबर को पूजा-अर्चना के लिए कई शुभ योग बन रहे हैं। श्रद्धालु अपनी सुविधा अनुसार इन मुहूर्तों में भगवान विश्वकर्मा की आराधना कर सकते हैं:



  • ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 05:58 बजे से 06:44 बजे तक

  • प्रातः सन्ध्या: सुबह 06:21 बजे से 07:30 बजे तक

  • सर्वार्थ सिद्धि योग: सुबह 07:30 बजे से शाम 04:23 बजे तक

  • रवि योग: सुबह 07:30 बजे से शाम 04:23 बजे तक

  • अभिजित मुहूर्त: दोपहर 01:20 बजे से 02:10 बजे तक

  • विजय मुहूर्त: दोपहर 03:50 बजे से शाम 04:40 बजे तक

  • गोधूलि मुहूर्त: शाम 07:59 बजे से रात 08:23 बजे तक

  • सायाह्न सन्ध्या: शाम 07:59 बजे से रात 09:09 बजे तक


पूजा सामग्री की सूची

विश्वकर्मा पूजन के लिए कुछ विशेष सामग्रियों की आवश्यकता होती है। इनमें भगवान विश्वकर्मा की तस्वीर या प्रतिमा, लकड़ी की चौकी, लाल या पीला कपड़ा, कलश, गंगाजल, घी, इत्र, रोली, अक्षत (चावल), चंदन, सुपारी, पान के पत्ते, लौंग, इलायची, कपूर, जनेऊ, कलावा (मौली), मौसमी फल, फूल, मिठाई और नारियल शामिल हैं।


पूजा विधि

पूजा के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और अपने कार्यस्थल की अच्छी तरह सफाई करें। पूरे परिसर में गंगाजल छिड़ककर शुद्धिकरण करें। इसके बाद लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाएं और उस पर जल से भरा कलश तथा भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा स्थापित करें। अपने कार्य में उपयोग होने वाले सभी औजारों, मशीनों और वाहनों को धोकर उन पर रोली, हल्दी और चंदन का तिलक लगाएं। इसके बाद धूप-दीप जलाकर आरती करें, फल-मिठाई का भोग लगाएं और व्यापार में तरक्की की कामना करते हुए सभी में प्रसाद वितरित करें।