☰
×

शरद पूर्णिमा और वाल्मीकि जयंती: जानें कब मनाए जाएंगे ये खास पर्व?

इस लेख में हम शरद पूर्णिमा और वाल्मीकि जयंती के महत्व और तिथियों के बारे में जानेंगे। 2026 में ये पर्व 25 और 26 अक्टूबर को मनाए जाएंगे। जानें कि किस दिन कौन सा पर्व मनाया जाएगा और इनका धार्मिक महत्व क्या है।
 

शरद पूर्णिमा और वाल्मीकि जयंती का महत्व


नई दिल्ली: हिंदू पंचांग के अनुसार, आश्विन पूर्णिमा का विशेष महत्व है। इस दिन शरद पूर्णिमा और महर्षि वाल्मीकि जयंती दोनों का आयोजन होता है। इस बार पूर्णिमा तिथि 25 और 26 अक्टूबर को पड़ रही है, जिससे लोगों में यह जानने की जिज्ञासा है कि कौन सा पर्व किस दिन मनाया जाएगा। आइए, पंचांग के अनुसार सही तिथियों का पता लगाते हैं।


पूर्णिमा तिथि का समय


पंचांग के अनुसार, पूर्णिमा तिथि 25 अक्टूबर 2026, रविवार को सुबह 11:57 बजे से शुरू होगी और 26 अक्टूबर 2026, सोमवार को सुबह 9:42 बजे तक रहेगी। शास्त्रों में दो अलग-अलग नियमों के कारण दोनों पर्व अलग-अलग दिन मनाए जाएंगे।


शरद पूर्णिमा का व्रत कब है?


शरद पूर्णिमा के लिए प्रदोष काल और निशीथ काल का ध्यान रखा जाता है। चंद्रमा की पूजा रात में होती है और खीर को चांद के नीचे रखा जाता है। जिस रात पूर्णिमा तिथि होती है, उसी दिन शरद पूर्णिमा मनाई जाती है। 25 अक्टूबर की रात को पूर्णिमा तिथि पूरी तरह से विद्यमान रहेगी, इसलिए शरद पूर्णिमा का व्रत और पूजा 25 अक्टूबर, रविवार को होगी।


वाल्मीकि जयंती का आयोजन कब होगा?


वाल्मीकि जयंती के लिए उदया तिथि देखी जाती है, यानी जिस दिन सूर्योदय के समय पूर्णिमा तिथि हो। 26 अक्टूबर, सोमवार को सुबह सूर्योदय के समय पूर्णिमा तिथि रहेगी। इसलिए, उदया तिथि के अनुसार वाल्मीकि जयंती 26 अक्टूबर को मनाई जाएगी। इसी दिन पूर्णिमा का स्नान-दान भी होगा।


शरद पूर्णिमा का महत्व


मान्यता है कि शरद पूर्णिमा को चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से पूर्ण होता है। इस रात चांद की किरणों से अमृत बरसता है। इसलिए, इस रात खुले आसमान के नीचे खीर रखी जाती है और अगली सुबह इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। कहा जाता है कि इसी दिन समुद्र मंथन से मां लक्ष्मी प्रकट हुई थीं। इस रात मां लक्ष्मी धरती पर भ्रमण करती हैं, इसलिए इस दिन लक्ष्मी-नारायण की पूजा करने से धन और सुख की प्राप्ति होती है।


वाल्मीकि जयंती का महत्व


आश्विन पूर्णिमा को महर्षि वाल्मीकि का जन्म हुआ था। उन्होंने रामायण की रचना की थी और भगवान राम के परम भक्त माने जाते हैं। इस दिन वाल्मीकि समाज के लोग उन्हें भगवान के रूप में पूजते हैं। मंदिरों को सजाया जाता है और रामायण की चौपाइयां पढ़ी जाती हैं। इसके साथ ही, इसी दिन से कार्तिक मास की शुरुआत भी होती है।