संतान सप्तमी व्रत: जानें इसके महत्व और नियम
संतान की लंबी उम्र के लिए माताओं का व्रत
Santaan Saptamee Vrat: यह व्रत भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष, यह तिथि 30 अगस्त को है। इस दिन भगवान सूर्य को समर्पित किया जाता है और इसे संतान सुख की प्राप्ति के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। आइए जानते हैं इस व्रत के नियम और कथा। भविष्य पुराण में भगवान सूर्य की पूजा के लिए अष्टदल का निर्माण करने का उल्लेख है।
भगवान को घी का दीपक दिखाना चाहिए और लाल फूल अर्पित करना चाहिए। यदि लाल कनेर का फूल उपलब्ध हो, तो यह और भी शुभ माना जाता है। इसके साथ गुड़ और आटे का प्रसाद भी अर्पित करें। सूर्य देव की पूजा करते समय लाल वस्त्र पहनना चाहिए।
संतान सप्तमी व्रत के नियम
- जो लोग संतान की कामना से यह व्रत रखते हैं, उन्हें इसे दोपहर तक पूरा करना चाहिए।
- शिव और पार्वती की प्रतिमा को चौकी पर रखकर उनकी पूजा करें। पूजा में नारियल, सुपारी और धूप दीप अर्पित करें।
- माताएं संतान की लंबी उम्र और सुरक्षा के लिए भगवान शिव को कलावा बांधें।
- कलावा को बाद में संतान की कलाई में बांध दें।
संतान सप्तमी व्रत की कथा
यह व्रत संतान सुख प्रदान करने वाला माना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों के युधिष्ठिर को इस दिन व्रत करने और सूर्य देव तथा लक्ष्मी नारायण की पूजा करने का महत्व बताया था। माता देवकी के पुत्रों को कंस द्वारा मारे जाने के बाद, लोमश ऋषि ने उन्हें संतान सप्तमी व्रत के बारे में बताया। माता ने इस व्रत को रखा और इसके नियमों का पालन किया, जिससे उनका पुत्र हुआ और उन्होंने कंस के अत्याचार से धरती को मुक्त किया।
एक अन्य कथा में, राजा नहुष की पत्नी चंद्रमुखी और उनकी सहेली रूपमती का उल्लेख है। चंद्रमुखी ने संतान सप्तमी व्रत का पूजन देखा और इसे करने का निश्चय किया, लेकिन समय के साथ भूल गईं। अंततः, उन्होंने कई योनियों में जन्म लिया और पुनः मनुष्य शरीर प्राप्त किया। रूपमती ने इस व्रत को किया और आठ संतानें प्राप्त की, जबकि चंद्रमुखी ने नहीं किया और इस जन्म में भी नि:संतान रहीं।