सावन सोमवार और प्रदोष व्रत का विशेष संयोग: पूजा विधि और महत्व
श्रावण मास में सावन सोमवार और प्रदोष व्रत का विशेष संयोग भक्तों के लिए महत्वपूर्ण है। जानें इस दिन की पूजा विधि और धार्मिक महत्व। क्या आप जानते हैं कि एक ही दिन में दोनों व्रत कैसे मनाए जा सकते हैं? इस लेख में हम आपको बताएंगे कि कैसे आप इन व्रतों का पालन कर सकते हैं और भगवान शिव की कृपा प्राप्त कर सकते हैं।
Aug 5, 2026, 11:23 IST
सावन मास का महत्व
श्रावण का महीना भगवान शिव के लिए अत्यंत प्रिय माना जाता है। इस दौरान हर सोमवार का विशेष महत्व होता है। इस महीने में भक्तजन भगवान भोलेनाथ की भक्ति में लीन हो जाते हैं, सच्चे मन से व्रत रखते हैं और पूजा-अर्चना करते हैं। कई भक्त सावन के महीने से 16 सोमवार व्रत का आरंभ करते हैं। इसके अलावा, हर महीने की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत का आयोजन किया जाता है, जो भगवान शिव को समर्पित है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, प्रदोष काल में शिव की पूजा का समय सर्वोत्तम माना जाता है।
सावन सोमवार और प्रदोष व्रत का संयोग
कभी-कभी पंचांग में ऐसा दुर्लभ संयोग बनता है जब सावन का सोमवार और प्रदोष व्रत एक ही दिन पड़ जाते हैं। इस स्थिति में साधक यह सोच में पड़ जाते हैं कि पूजा कैसे की जाए? क्योंकि दोनों व्रतों का अपना अलग महत्व है। आइए जानते हैं कि इस स्थिति में क्या करना चाहिए।
धार्मिक ग्रंथों की मान्यता
धार्मिक शास्त्र क्या कहते हैं?
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, जब सावन सोमवार और प्रदोष व्रत एक साथ आते हैं, तो इसे भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा का महा-संयोग माना जाता है। इस दिन की गई श्रद्धापूर्ण पूजा से जीवन में सुख और शांति आती है। इसलिए, आपको दोनों व्रत अलग-अलग रखने की आवश्यकता नहीं है। आप एक ही दिन में दोनों व्रत के नियमों का पालन कर सकते हैं।
पूजा विधि
सही पूजा-विधि
इस विशेष संयोग के दौरान आप सुबह और शाम दोनों समय पूजा कर सकते हैं।
सुबह की पूजा (सोमवार व्रत के लिए)
सुबह की पूजा
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ कपड़े पहनें। भगवान शिव का स्मरण करते हुए दोनों व्रत का संकल्प लें। इसके बाद शिवलिंग का जल या पंचामृत से अभिषेक करें। 'ॐ नमः शिवाय' का जप करते हुए बेलपत्र अर्पित करें और सोमवार व्रत की कथा अवश्य पढ़ें।
शाम की पूजा (प्रदोष व्रत के लिए)
शाम की पूजा
प्रदोष व्रत की असली महत्व संध्या काल यानी 'प्रदोष काल' में होती है। यह समय सूर्यास्त से लेकर लगभग 2 घंटे बाद तक रहता है। शाम को एक बार फिर स्नान करें या हाथ-मुंह धोकर स्वच्छ हो जाएं। इसके बाद शिवलिंग पर दूध, बेलपत्र, धतूरा, चंदन और अक्षत अर्पित करें। इसके बाद प्रदोष व्रत की कथा सुनें, दीपदान करें और अंत में भगवान शिव की आरती करें। व्रत का पारण (खोलना) आप अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार शाम की पूजा या अगले दिन सुबह कर सकते हैं।