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सुखविंदर सिंह: सुरों के बादशाह की कहानी

सुखविंदर सिंह, जिनकी आवाज ने ऑस्कर तक की यात्रा की है, का बचपन संगीत से भरा हुआ था। स्कूल में होमवर्क न करने पर शिक्षक उन्हें गाने के लिए प्रेरित करते थे। महज 8 साल की उम्र में उन्होंने मंच पर कदम रखा और 13 साल की उम्र में भांगड़ा गीत की धुन बनाई। एआर रहमान के साथ काम करते हुए उन्होंने 'छैय्या छैय्या' जैसे हिट गाने दिए। जानें उनकी प्रेरणादायक यात्रा के बारे में, जो आज भी जारी है।
 

सुखविंदर सिंह का संगीत सफर

मुंबई: गायक सुखविंदर सिंह के बचपन के बारे में कहा जाता है कि उनकी मधुर आवाज के चलते जब वे स्कूल में होमवर्क नहीं कर पाते थे, तो शिक्षक उन्हें डांटने के बजाय गाने के लिए प्रेरित करते थे। इस छोटे बच्चे को यह नहीं पता था कि उसकी आवाज एक दिन ऑस्कर के मंच पर गूंजेगी।


ऑस्कर, जिसे एकेडमी अवार्ड्स के नाम से भी जाना जाता है, फिल्म उद्योग में उत्कृष्टता के लिए दिया जाने वाला सबसे बड़ा सम्मान है।


सुखविंदर सिंह का जन्म 18 जुलाई 1971 को अमृतसर में एक सिख परिवार में हुआ। उन्होंने केवल 8 साल की उम्र में मंच पर कदम रखा और 1970 की फिल्म 'अभिनेत्री' का प्रसिद्ध गीत 'सा रे गा मा पा' गाकर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनकी संगीत प्रतिभा इतनी अद्वितीय थी कि 13 साल की उम्र में उन्होंने मशहूर गायक मलकीत सिंह के लिए भांगड़ा गीत 'तूतक तूतक तूतिया' की धुन तैयार की, जो आज भी लोक संगीत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।


किशोरावस्था में, सुखविंदर ने गुरु प्रोफेसर बीएस नारंग से शास्त्रीय संगीत का प्रशिक्षण लिया और फिर मुंबई में प्रसिद्ध संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के साथ 'म्यूजिक अरेंजर' के रूप में काम करना शुरू किया। हालांकि, उन्होंने मुंबई की चकाचौंध छोड़कर कुछ समय के लिए इंग्लैंड और अमेरिका की यात्रा की, जहां उन्होंने वैश्विक संगीत की विभिन्न शैलियों को सीखा। यह उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ, जिसने उनकी आवाज में सूफी और लोक संगीत का अनूठा मिश्रण पैदा किया।


जब सुखविंदर भारत लौटे, तो उन्होंने दक्षिण भारत में एआर रहमान के साथ काम किया। उन्होंने एक साक्षात्कार में बताया कि उन्होंने 'थैया थैया' नाम की एक धुन बनाई थी, जिसे एआर रहमान ने पहचाना और गुलजार ने इसके बोल लिखे। इस प्रकार 1998 की फिल्म 'दिल से' का प्रसिद्ध गीत 'छैय्या छैय्या' बना।


1998 में 'छैंया छैंया' के लिए उन्हें फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ पुरुष पार्श्वगायक पुरस्कार मिला। 2007 में 'चक दे इंडिया' भारतीय खेलों का राष्ट्रीय गीत बना। 2008 में 'हौले हौले' को फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। उसी वर्ष 'जय हो' ने ऑस्कर और ग्रैमी जीते। 2014 में 'बिस्मिल' के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।


डिजिटल युग में भी सुखविंदर सिंह कभी 'ऑटो-ट्यून' का सहारा नहीं लेते। वे वर्तमान में फिल्मों के लिए पार्श्व गायन कर रहे हैं और कई लाइव कॉन्सर्ट में भाग ले रहे हैं। हाल ही में उन्होंने 'शतक', 'बॉर्डर 2' और 'ओ' रोमियो' जैसी फिल्मों के लिए गाने गाए हैं।