हरियाली तीज: प्रेम और आस्था का उत्सव
हरियाली तीज का पर्व श्रावण मास में मनाया जाता है, जो विशेष रूप से महिलाओं के लिए समर्पित है। यह उत्सव शिव और पार्वती के पुनर्मिलन का प्रतीक है। इस दिन महिलाएं झूला झूलने, लोकगीत गाने और आनंद मनाने में व्यस्त रहती हैं। जानें इस त्योहार की परंपराएं, महत्व और सांस्कृतिक मान्यताएं।
Aug 14, 2026, 15:21 IST
हरियाली तीज का महत्व
हरियाली तीज का पर्व श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है, जो विशेष रूप से महिलाओं के लिए समर्पित है। इस समय जब प्रकृति हरी चादर ओढ़ लेती है, महिलाएं खुशी से नृत्य करती हैं और झूले झूलती हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश में इसे कजली तीज के नाम से भी जाना जाता है। यह उत्सव शिव और पार्वती के पुनर्मिलन का प्रतीक है, और इसे हरियाली तीज भी कहा जाता है। इस दिन महिलाएं झूला झूलने, लोकगीत गाने और आनंद मनाने में व्यस्त रहती हैं।
त्योहार की परंपराएं
हरियाली तीज का पर्व विशेष रूप से उत्तर भारत के राज्यों जैसे राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में धूमधाम से मनाया जाता है। नवविवाहिताएं इस दिन अपने मायके में व्रत रखती हैं, जहां झूले सजाए जाते हैं और लोक गीत गाए जाते हैं। कई स्थानों पर मेले भी लगते हैं और माता पार्वती की सवारी निकाली जाती है।
श्रावण का माहौल
श्रावण का महीना बारिश के साथ हरियाली का प्रतीक है। इस दौरान महिलाएं भगवान शिव की पूजा करती हैं और कावड़िए जल लेकर शिव का अभिषेक करते हैं। हरियाली तीज का पर्व महिलाओं के लिए विशेष उल्लास का समय होता है, जिसमें वे अपने दांपत्य जीवन की खुशियों के लिए प्रार्थना करती हैं।
त्योहार की विशेषताएं
हरियाली तीज पर महिलाएं मेहंदी लगाती हैं, चूड़ियां पहनती हैं और झूला झूलती हैं। इस दिन बड़े-बड़े वृक्षों की शाखाओं पर झूले लगाए जाते हैं। राजस्थान में, जिन कन्याओं की सगाई हो चुकी होती है, उन्हें एक दिन पहले सिंझारा भेंट किया जाता है, जिसमें मेहंदी, चूड़ियां और मिठाइयां शामिल होती हैं।
सांस्कृतिक मान्यताएं
माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए इस व्रत का पालन किया था। इस दिन महिलाएं उपवास रखकर भगवान शिव और पार्वती की पूजा करती हैं। इस पर्व का उद्देश्य दांपत्य जीवन में सुख और समृद्धि की कामना करना है।
समाज में तीज का प्रभाव
हरियाली तीज का पर्व भारतीय संस्कृति में गहराई से बसा हुआ है। यह न केवल एक त्योहार है, बल्कि यह महिलाओं की सांस्कृतिक मान्यताओं का प्रतीक भी है। आज के समय में भी यह पर्व अपनी परंपराओं के साथ जीवित है, और इसे मनाने का तरीका धीरे-धीरे बदलता जा रहा है।