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हरियाली तीज: शिव-पार्वती का दिव्य मिलन और महिलाओं का पर्व

हरियाली तीज, हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो भगवान शिव और माता पार्वती के मिलन का प्रतीक है। यह त्यौहार हर साल सावन के महीने में मनाया जाता है, जिसमें महिलाएं अपने पतियों की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं। इस दिन श्रृंगार का विशेष महत्व होता है, और महिलाएं हरे रंग के कपड़े पहनकर पूजा करती हैं। जानें इस पर्व की मान्यताएं, परंपराएं और इसके पीछे की पौराणिक कथाएं।
 

हरियाली तीज का महत्व

हिंदू धर्म में 'तीज' पर्व का विशेष स्थान है, जो साल में तीन बार मनाया जाता है। सबसे पहले सावन में 'हरियाली तीज', फिर 'कजरी तीज' और अंत में 'हरतालिका तीज' आती है। ये सभी पर्व भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित हैं और पूरे देश में धूमधाम से मनाए जाते हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार, सावन शुक्ल तृतीया तिथि 14 अगस्त को शाम 6:46 बजे शुरू होगी और 15 अगस्त को शाम 5:28 बजे समाप्त होगी। इसलिए, उदया तिथि के अनुसार हरियाली तीज 15 अगस्त को मनाई जाएगी। यह त्यौहार श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है, जिसका उल्लेख सनातन शास्त्रों में भी मिलता है। यह शिव-पार्वती की पूजा के साथ-साथ महिलाओं के सजने-संवरने और खुशियों का पर्व है। हरियाली तीज को हिंदू धर्म में महत्वपूर्ण व्रतों में से एक माना जाता है।


हरियाली तीज का व्रत और मान्यता

हरियाली तीज का व्रत अपार भक्ति और उत्साह के साथ मनाया जाता है, जो भगवान शिव और देवी पार्वती के मिलन का प्रतीक है। मान्यता है कि इस दिन पूजा करने से कई गुना फल की प्राप्ति होती है। पौराणिक कथा के अनुसार, इसी दिन माता पार्वती को 107 जन्मों की तपस्या के बाद भगवान शिव ने अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड जैसे कई राज्यों में सुहागिन महिलाएं निर्जला व्रत रखकर अपने पतियों की लंबी उम्र के लिए प्रार्थना करती हैं।


तीज पर्व का उत्सव

तीज पर्व उस दिन को याद करते हुए मनाया जाता है, जब भगवान शिव ने देवी पार्वती को पत्नी के रूप में स्वीकार किया। धार्मिक मान्यता के अनुसार, 'हरियाली तीज' व्रत करने से विवाहित महिलाओं का जीवन खुशियों से भर जाता है और उनके पतियों को लंबी आयु का आशीर्वाद मिलता है। अविवाहित लड़कियां भी इस दिन व्रत करती हैं, जिससे उनकी शीघ्र शादी के योग बनते हैं। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा का विधान है। विवाहित महिलाएं अपने पतियों की सलामती के लिए यह व्रत रखती हैं।


हरियाली तीज का मौसम और परंपराएं

श्रावण महीने में आने वाली इस 'तीज' को 'हरियाली तीज' इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह मानसून के मौसम में मनाया जाता है, जब वातावरण हरा-भरा होता है। इस दिन वृक्ष, नदियों और जल के देवता वरुण देव की भी उपासना की जाती है। इसे 'सिंधारा तीज' भी कहा जाता है, जो नवविवाहितों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। हरियाली तीज को 'सावन तीज', 'छोटी तीज', 'मधुश्रवा तीज' जैसे नामों से भी जाना जाता है।


श्रृंगार और व्रत की परंपरा

इस दिन श्रृंगार का विशेष महत्व है। सुहागिन महिलाएं अपने हाथों पर मेहंदी लगाती हैं, हरे या लाल रंग के कपड़े पहनती हैं और हरी चूड़ियां पहनती हैं। मान्यता है कि इस दिन श्रृंगार करने से माता पार्वती प्रसन्न होती हैं। हरे रंग का विशेष महत्व होता है, जो प्रकृति का प्रतीक है। हरियाली तीज के मौके पर महिलाएं हरी साड़ी और हरी चूड़ियां पहनती हैं।


वट वृक्ष की पूजा और उत्सव

हरियाली तीज में वट वृक्ष की पूजा का विशेष महत्व है। महिलाएं वट वृक्ष की शाखाओं पर झूले डालकर दिनभर झूलती हैं, नृत्य करती हैं और लोकगीत गाती हैं। इस दिन महिलाएं कठोर निर्जला व्रत रखती हैं, जिसमें वे पूरे दिन भोजन और जल से परहेज करती हैं। शाम को चंद्रमा की पूजा के साथ व्रत का समापन किया जाता है।


पौराणिक कथा और परंपरा

हरियाली तीज का व्रत पर्वतराज हिमालय की पुत्री माता पार्वती द्वारा शुरू किया गया था। माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। इस व्रत के प्रभाव से भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया। इस दिन को माता पार्वती और भगवान शिव के पुनर्मिलन के रूप में मनाया जाता है।