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भारत के विकास के लिए फाफड़ा मॉडल की आवश्यकता

इस लेख में भारत के विकास के लिए फाफड़ा मॉडल की आवश्यकता पर चर्चा की गई है। प्रधानमंत्री मोदी के 12 साल पुराने "पकौड़ा-चाय-ठेला मॉडल" को बदलकर एक संगठित उत्पादन प्रणाली की आवश्यकता है। जानें कैसे यह मॉडल देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकता है और अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले करोड़ों लोगों की जिंदगी को प्रभावित कर सकता है।
 

फाफड़ा मॉडल का महत्व

ईरान के समर्पण या नेतन्याहू-ट्रंप के सामने खुमैनी के समर्पण जैसी स्थिति को छोड़कर, आने वाले महीनों में प्रधानमंत्री मोदी के 12 साल पुराने "पकौड़ा-चाय-ठेला मॉडल" की चर्चा होने वाली है। उन्हें इस मॉडल को बदलकर गुजराती फाफड़े के संगठित उत्पादन का राष्ट्रीय मिशन बनाना होगा। इसका मतलब है कि फाफड़ा को राष्ट्रीय स्नैक के रूप में मान्यता दी जाए। करोड़ों लोगों की ठेलों, रेहड़ियों, और दुकानों के स्थान पर भारतीय उद्यमिता के प्रतीक अंबानी और अडानी की फाफड़ा फैक्ट्रियों का निर्माण किया जाए। इससे गैस सिलेंडरों और गंदगी जैसी समस्याओं से छुटकारा मिलेगा।


आबादी की चुनौतियाँ

सवाल यह है कि देश की 160-170 करोड़ (2047 की अनुमानित जनसंख्या) की आबादी के वे 90 प्रतिशत लोग क्या करेंगे, जो आज भी राशन, सब्सिडी और खैरात पर निर्भर हैं? इसका उत्तर स्पष्ट है। जब 2014 से 2026 तक नोटबंदी, कोविड, जीएसटी और तेल-ईंधन के संकट से कुछ नहीं हुआ, तो भविष्य में भी कुछ नहीं होगा।


मोदी का योगदान

मोदीजी ने भारत को कई तरीकों से गुरु बनाया है। "पकौड़ा-चाय-ठेला मॉडल" इसका एक उदाहरण है। मनरेगा से लेकर किसानों को सम्मान राशि, महिलाओं को लाडली बहना राशि बांटने और युवाओं को नौकरी पत्र देने के समारोह, क्या ये सब उनकी गुरुता नहीं दर्शाते?


विकसित भारत का विजन

इसलिए, यह व्यंग्य नहीं है, बल्कि मोदीजी के अच्छे दिनों का अंतिम लक्ष्य है, अर्थात विकसित भारत का असली विजन। आगे की सच्चाई यह है कि "पकौड़ा-चाय-ठेला मॉडल" के भी बुरे दिन आ सकते हैं।


आर्थिक चुनौतियाँ

मोदीजी का यह भी कीर्तिमान है कि 12 सालों में रुपया प्रति डॉलर 60 रुपये से बढ़कर 92 रुपये हो गया है। यदि यह सौ रुपये प्रति डॉलर तक पहुंचता है, तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी।


अनौपचारिक क्षेत्र का योगदान

पकौड़ा के रोजगार (अनौपचारिक क्षेत्र) पर देश की श्रमशक्ति का लगभग 90-92 प्रतिशत हिस्सा निर्भर है। महानगरों और शहरों में सड़क किनारे के ठेले-रेहड़ियों से सीधे 4 करोड़ लोगों की जिंदगी जुड़ी हुई है।


फाफड़ा मॉडल का समाधान

इसलिए, इन समस्याओं से निजात पाने का तरीका गुजराती स्वाद और उद्यमिता का "फाफड़ा मॉडल" है।