इसरो के निजीकरण पर कर्मचारियों का विरोध, सरकार से मांगी सफाई
इसरो के निजीकरण पर विवाद
नई दिल्ली। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के निजीकरण की संभावनाओं को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया है। इसरो के कर्मचारियों ने इस मुद्दे पर सरकार से स्पष्टता की मांग की है। नौ कर्मचारी संगठनों ने इसरो के प्रमुख वी नारायणन को एक पत्र भेजकर निजीकरण के बारे में स्पष्टीकरण देने का अनुरोध किया है। यह पत्र चार सितंबर को लिखा गया था, जिसकी जानकारी रविवार, छह सितंबर को मिली। कर्मचारियों का कहना है कि सरकारी संस्थानों में निजी कंपनियों की भागीदारी हो सकती है, लेकिन इसरो को एक मजबूत संगठन के रूप में बनाए रखना आवश्यक है।
कर्मचारियों के पत्र के प्रकाश में आने के बाद, कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर टिप्पणी की कि स्पेस एजेंसी के भीतर से आवाजें उठने लगी हैं। उन्होंने कहा कि जब साराभाई और धवन की विरासत को व्यवस्थित तरीके से समाप्त किया जा रहा है, तो अन्य लोगों को भी चुप नहीं रहना चाहिए। हाल के दिनों में यह खबरें आई हैं कि सेटेलाइट निर्माण का कार्य निजी कंपनियों को सौंपा जाएगा और इसरो केवल अनुसंधान का कार्य करेगा।
इस विषय पर इन स्पेस के प्रमुख पवन गोयनका का एक बयान भी चर्चा में है। उन्होंने 21 अगस्त को एक कार्यक्रम में कहा था कि इसरो भविष्य में कोई लॉन्च व्हीकल नहीं बनाएगा और यह कार्य निजी क्षेत्र या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों द्वारा किया जाएगा। ध्यान रहे कि इन स्पेस का उद्देश्य निजी क्षेत्र की अंतरिक्ष गतिविधियों को बढ़ावा देना, मंजूरी देना और उनकी निगरानी करना है।
बताया जा रहा है कि इस बयान के बाद से इसरो में असंतोष बढ़ गया है। कर्मचारी संगठनों ने कहा है कि इसरो की तकनीक, परीक्षण सुविधाएं और लॉन्च इंफ्रास्ट्रक्चर जनता के धन से विकसित हुए हैं, इसलिए इन्हें निजी कंपनियों को सौंपने की प्रक्रिया पारदर्शी और जवाबदेह होनी चाहिए। दूसरी ओर, रमेश ने सोशल मीडिया पर लिखा है कि स्टार्टअप को बढ़ावा देने के नाम पर मोदी सरकार इसरो की भूमिका को कम कर रही है। उन्होंने कहा कि इसरो की विकसित तकनीक और क्षमताएं निजी कंपनियों को दी जा रही हैं, जिनका भविष्य अनिश्चित है।