आयुर्वेद में बढ़ती धोखाधड़ी: मरीजों को सतर्क रहने की आवश्यकता
आयुर्वेद का सही उपयोग और मरीजों की सुरक्षा
मरीजों को हमेशा सतर्क रहना चाहिए। अगली बार जब आप किसी उपचार केंद्र में जाएं, तो उपाधि के बजाय रजिस्ट्रेशन की जानकारी मांगें। चमत्कारिक उपचार के बजाय लिखित निदान और सूचित सहमति की मांग करें। जो लोग कैमरे पर आयुर्वेदाचार्य बनते हैं, वे अक्सर केवल मैट्रिक पास या स्नातक होते हैं, और वे चिकित्सक नहीं हो सकते।
आयुर्वेद भारत की प्राचीन चिकित्सा प्रणाली है, लेकिन हाल के वर्षों में एक नया उद्योग उभरा है, जिसमें स्व-घोषित आयुर्वेदाचार्य गंभीर बीमारियों के इलाज का दावा करते हैं। ये लोग विभिन्न क्लिनिक, यूट्यूब चैनल और सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों तक पहुँच रहे हैं। सवाल यह नहीं है कि आयुर्वेद प्रभावी है या नहीं, बल्कि यह है कि कुछ लोग नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं जो मरीजों की सुरक्षा के लिए बनाए गए हैं।
स्वास्थ्य राज्य का विषय है, लेकिन आयुर्वेद का नैदानिक अभ्यास करने के लिए मान्यता प्राप्त योग्यता आवश्यक है, जैसे कि बीएएमएस डिग्री और संबंधित रजिस्ट्रेशन। क्लिनिक चलाने के लिए आवश्यक लाइसेंस और पंजीकरण की अनुपस्थिति में, किसी भी उपचार को जनस्वास्थ्य के लिए खतरा माना जा सकता है।
सबसे बड़ा उल्लंघन उपाधि का है। 'आचार्य' एक सम्मानसूचक शब्द है, लेकिन इसे चिकित्सक के रूप में प्रस्तुत करना गलत है। कई लोग खुद को 'आयुर्वेद प्रैक्टिशनर' या 'हीलिंग एक्सपर्ट' के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जबकि उनकी शैक्षणिक योग्यता अक्सर बीएएमएस से कम होती है।
दावों का उल्लंघन भी गंभीर है। औषधि एवं चमत्कारिक उपचार अधिनियम, 1954 के तहत ऐसे दावों का विज्ञापन करना अवैध है। यदि कोई व्यक्ति अतिरंजित या असत्यापित दावे करता है, तो यह कानून का उल्लंघन है।
संरचना का उल्लंघन भी देखा गया है, जहां कई क्लिनिक बिना उचित लाइसेंस के चल रहे हैं। ऐसे मामलों में, मरीजों को सावधान रहना चाहिए और सुनिश्चित करना चाहिए कि वे रजिस्टर्ड चिकित्सकों से ही उपचार प्राप्त कर रहे हैं।
अंत में, मरीजों को चाहिए कि वे उपचार केंद्रों में जाने से पहले उपाधि के बजाय रजिस्ट्रेशन की जानकारी मांगें। आयुर्वेद को बचाने के लिए इसे गुरु-व्यक्तित्व से अलग करना आवश्यक है।