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दिमाग में सूअर का कीड़ा: एक अनोखी चिकित्सा कहानी

स्पेन के एक 60 वर्षीय व्यक्ति को सिरदर्द और धुंधली दृष्टि की समस्या थी, जिसे डॉक्टरों ने ब्रेन कैंसर समझा। लेकिन जब गहन जांच की गई, तो पता चला कि उसके दिमाग में सूअर का कीड़ा था। यह मामला चिकित्सा जगत में एक अनोखी कहानी बन गया है, जो यह दर्शाता है कि गंभीर लक्षण हमेशा कैंसर का संकेत नहीं होते। जानें इस रहस्यमय संक्रमण के बारे में और इसके उपचार के तरीके।
 

नई दिल्ली में एक अनोखा मामला

नई दिल्ली: स्पेन के 60 वर्षीय एक व्यक्ति को लगातार सिरदर्द और धुंधली दृष्टि की समस्या थी। उसकी स्थिति को देखकर चिकित्सकों ने सोचा कि उसे ब्रेन ट्यूमर या ब्रेन कैंसर जैसी गंभीर बीमारी हो सकती है। प्रारंभिक स्कैन में भी उसके मस्तिष्क में कैंसर के संकेत दिखाई दिए। लेकिन जब उच्च-रिज़ॉल्यूशन एमआरआई की गई, तो जो परिणाम सामने आया, उसने चिकित्सा टीम को चौंका दिया।


दिमाग में ट्यूमर नहीं, बल्कि सूअर का कीड़ा

रिपोर्ट के अनुसार, गहन जांच के बाद पता चला कि व्यक्ति के मस्तिष्क में कोई ट्यूमर नहीं था, बल्कि वहां टायनिया सोलियम नामक टेपवर्म का लार्वा मौजूद था। इसे चिकित्सा में 'न्यूरोसिस्टिसरकोसिस' कहा जाता है। विशेष रक्त परीक्षण ने इस परजीवी संक्रमण की पुष्टि की। यह जानकर राहत मिली कि जिसे लाइलाज कैंसर समझा जा रहा था, वह वास्तव में एक ऐसा संक्रमण था जिसका उपचार संभव था।


यह परजीवी कैसे पहुंचता है इंसान के दिमाग तक?

लोगों का मानना है कि यह बीमारी केवल संक्रमित या अधपका सूअर का मांस खाने से होती है, लेकिन इस मामले में स्थिति भिन्न थी। जब टेपवर्म के सूक्ष्म अंडे किसी तरह मुंह के जरिए शरीर में प्रवेश करते हैं, तो वे आंतों में जाकर लार्वा में बदल जाते हैं। इसके बाद यह लार्वा रक्त के माध्यम से शरीर के विभिन्न हिस्सों, यहां तक कि मस्तिष्क में भी पहुंच जाता है। मस्तिष्क में पहुंचकर यह तरल पदार्थ से भरी छोटी गांठें बनाता है, जो समय के साथ कठोर हो जाती हैं और गंभीर समस्याएं उत्पन्न करती हैं।


दवाओं से सफल उपचार

चिकित्सकों ने मरीज का उपचार एंटी-पैरासाइट दवाओं (एल्बेंडाजोल और प्राजिक्वांटेल) से शुरू किया। इसके साथ ही सूजन कम करने और सिरदर्द को नियंत्रित करने के लिए अन्य दवाएं भी दी गईं, जिससे मरीज की जान बच गई। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, हर साल लगभग 28 लाख लोग इस प्रकार के परजीवी संक्रमण का शिकार होते हैं, विशेष रूप से एशिया, दक्षिण अमेरिका और पूर्वी यूरोप में। यह मामला इस बात का प्रमाण है कि गंभीर लक्षण हमेशा कैंसर का संकेत नहीं होते और सही तकनीक से जांच करने पर असली समस्या का पता लगाया जा सकता है।