प्रमिला ताई मेढे: मातृशक्ति की प्रेरणा और राष्ट्र सेविका समिति की स्तंभ
प्रमिला ताई मेढे का योगदान
प्रमिला ताई मेढे: स्त्री राष्ट्र निर्माण की नींव है। इसी विचार के साथ, राष्ट्रसेविका समिति पिछले 90 वर्षों से भारत की महिलाओं के विकास में सक्रिय है। श्रद्धेय प्रमिला ताई जी इस संगठन की चौथी मूल स्तंभ थीं। जिस तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व्यक्ति निर्माण में लगा है, राष्ट्र सेविका समिति का कार्यक्षेत्र भी लगातार बढ़ रहा है। यह समिति समाज के विभिन्न वर्गों की महिलाओं के लिए एक ऐसा मंच बन चुकी है, जो सकारात्मकता और रचनात्मकता के माध्यम से राष्ट्र को नई दिशा देने में जुटी है। इसके कार्यक्रमों और योजनाओं का सीधा लाभ भारतीय महिलाओं को मिल रहा है।
प्रमिला ताई का निधन
राष्ट्र सेविका समिति की चौथी प्रमुख संचालिका, वंदनीय प्रमिला ताई जी मेढे का निधन भारत की महाशक्ति के सक्षम नेतृत्व के लिए एक अपूरणीय क्षति है। 31 जुलाई को प्रातः 9:05 बजे नागपुर में देवी अहिल्या मंदिर में वृद्धावस्था के कारण उन्होंने अंतिम सांस ली। ताई जी का 97 वर्ष का जीवन मातृशक्ति की तपस्विता, सक्रियता, जागरूकता और राष्ट्रनिष्ठा का अद्वितीय उदाहरण है, जिससे भारत की भावी पीढ़ी को हमेशा सीखने को मिलेगा।
प्रमिला ताई का जीवन और कार्य
प्रमिला ताई जी के जीवन और उनके कार्यों को संक्षेप में बताना कठिन है। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी राष्ट्र की मातृशक्ति के लिए संकल्प और साहस के साथ कार्य किया। उन्होंने राष्ट्र सेविका समिति की केंद्र कार्यालय प्रमुख, अखिल भारतीय प्रमुख कार्यवाहिका, और अन्य महत्वपूर्ण दायित्व संभाले। उन्होंने भारत के साथ-साथ श्रीलंका, केनिया, यूनाइटेड किंगडम और अमेरिका में भी महत्वपूर्ण कार्य किए। अमेरिका में उन्हें न्यू जर्सी का मानद नागरिकत्व भी मिला था। 2020 में एस एन डी टी विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें डिलीट पदवी प्रदान की गई थी।
प्रमिला ताई का प्रभाव
प्रमिला ताई जी ने 2003-2004 में मौसीजी की जन्मशताब्दी वर्ष के अवसर पर पूरे भारत और नेपाल में चित्र प्रदर्शनी का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने 28,000 किलोमीटर की यात्रा की। उनकी आयु उस समय 75 वर्ष थी। जब वह अंग्रेजी में भाषण देती थीं, तो लोग उनकी प्रतिभा से चकित रह जाते थे। केनिया में सेविकाओं के लिए 'सरस्वती सदन' का उद्घाटन भी उन्होंने किया। उनकी पुस्तक 'वयं विश्वशान्त्यै चिरं यत्नशीलाः' में उन्होंने अपने अनुभव साझा किए हैं।
प्रमिला ताई का अनुशासन और समर्पण
प्रमिला ताई जी का जीवन अनुशासन और समर्पण का प्रतीक था। उन्होंने कभी भी समयपालन और अनुशासन में समझौता नहीं किया। उनके पास अनेक गीत कंठस्थ थे और वे कार्यक्रमों में उन्हें गाने का आग्रह करती थीं। उन्होंने हमेशा अपने प्रवास के दौरान स्थानीय भाषाओं के कुछ शब्द और गीत की पंक्तियाँ बोलने का प्रयास किया। उनकी कुशाग्र बुद्धिमत्ता और अध्ययन का प्रभाव आज भी विद्वानों पर दिखाई देता है।
श्रद्धांजलि
“चले निरंतर चिंतन मंथन,
चले निरंतर अथक प्रयास,
भारत मां की सेवा में हो,
अपने जीवन का हर श्वास,
मन में परम विजय विश्वास!”
ऐसी परम श्रद्धेय प्रमिला ताई जी को उनके महाप्रयाण पर विनम्र श्रद्धांजलि।
लेखिका का परिचय