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बच्चों में डायबिटीज से बचाव के उपाय: जानें कैसे करें प्रबंधन

डायबिटीज एक गंभीर समस्या बनती जा रही है, खासकर बच्चों में। माता-पिता के लिए यह जानना आवश्यक है कि कैसे उनके बच्चों को इस बीमारी से बचाया जा सकता है। इस लेख में, हम डायबिटीज के कारण, लक्षण और रोकथाम के उपायों पर चर्चा करेंगे। जानें कि कैसे स्वस्थ आहार, नियमित शारीरिक गतिविधि और पर्याप्त नींद बच्चों में डायबिटीज के जोखिम को कम कर सकते हैं।
 

डायबिटीज: एक बढ़ती हुई समस्या

डायबिटीज आज एक गंभीर वैश्विक चुनौती बन चुकी है। लगभग हर दूसरे घर में इस बीमारी का कोई न कोई शिकार होता है। इसीलिए हाल के वर्षों में इस बीमारी के प्रति जागरूकता में वृद्धि हुई है। विशेषकर जब माता-पिता में से किसी एक को डायबिटीज हो, तो बच्चों में भी इसके विकसित होने का खतरा बढ़ जाता है। इस लेख में, हम जानेंगे कि बच्चों में डायबिटीज कैसे होती है और इसे कैसे रोका जा सकता है।


जेनेटिक डायबिटीज का खतरा

यदि माता-पिता को डायबिटीज है, तो बच्चों में भी इस बीमारी का खतरा बना रहता है, जिसे हम जेनेटिक डायबिटीज कहते हैं। यह आमतौर पर माता-पिता से बच्चों में जीन के माध्यम से ट्रांसफर होता है। यदि माता-पिता के डीएनए में ऐसे 'ससेप्टिबिलिटी जीन्स' हैं जो इंसुलिन के प्रति शरीर की प्रतिक्रिया को प्रभावित करते हैं, तो यह बच्चों को विरासत में मिल सकते हैं।


टाइप 1 डायबिटीज

टाइप 1 डायबिटीज एक ऑटोइम्यून स्थिति है। यदि पिता को टाइप 1 डायबिटीज है, तो बच्चे में इसके विकसित होने की संभावना 17 में से 1 होती है। वहीं, यदि मां को टाइप 1 डायबिटीज है और बच्चे का जन्म 25 वर्ष से पहले हुआ है, तो उन बच्चों में इसका खतरा 25 में से 1 है। यदि जन्म 25 वर्ष के बाद हुआ, तो यह खतरा 100 में से 1 हो जाता है।


टाइप 2 डायबिटीज

यह समस्या जीन और जीवनशैली के संयोजन से उत्पन्न होती है। यदि परिवार में पहले से किसी को टाइप 2 डायबिटीज है, तो यह पहचानना कठिन हो जाता है कि यह जीवनशैली के कारण है या आनुवंशिकी के कारण।


जेनेटिक डायबिटीज के कारण

जब माता-पिता से ऐसे जीन मिलते हैं जो शरीर को इंसुलिन का सही उपयोग नहीं करने देते, तो टाइप 2 डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है। जब हमारे सेल्स इंसुलिन की बात मानना बंद कर देते हैं, तो इसे इंसुलिन रेजिस्टेंस कहा जाता है, जिससे रक्त में शुगर का स्तर बढ़ने लगता है।


बीटा सेल डिस्फंक्शन

पैनक्रियाज वह अंग है, जिसमें बीटा सेल्स होती हैं, जो इंसुलिन हार्मोन का उत्पादन करती हैं। इंसुलिन का कार्य रक्त से शुगर को निकालकर शरीर की कोशिकाओं तक पहुंचाना है। इंसुलिन रेजिस्टेंस के कारण पैनक्रियाज बीटा सेल्स का उत्पादन नहीं कर पाती, जिससे डायबिटीज का खतरा बढ़ता है।


अन्य कारक

यदि परिवार में किसी को पहले से डायबिटीज है और उनकी जीवनशैली भी खराब है, तो डायबिटीज का जोखिम और बढ़ जाता है। जो बच्चे अधिक कैलोरी वाला खाना खाते हैं, उनका वजन अधिक होता है और वे अक्सर तनाव में रहते हैं, उनमें डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है।


लक्षण

आंखों की रोशनी में अचानक बदलाव, घाव भरने में अधिक समय लगना, अत्यधिक प्यास लगना, बिना कारण वजन घटना, बार-बार पेशाब आना, त्वचा का काला पड़ना, थकान और कमजोरी।


टाइप 2 और प्री-डायबिटीज के लिए टेस्ट

एचबीए1सी टेस्ट के माध्यम से पिछले 2 से 3 महीनों का औसत शुगर लेवल पता लगाया जा सकता है। यह बच्चों में डायबिटीज का पता लगाने का सबसे सरल तरीका है।


फास्टिंग प्लाज्मा ग्लूकोज टेस्ट सुबह खाली पेट किया जाता है, जिसमें बच्चे को 8 से 10 घंटे तक भूखा रहना होता है।


ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट में ग्लूकोज वाला पानी दिया जाता है और 2 घंटे बाद शुगर लेवल चेक किया जाता है।


बच्चों को डायबिटीज से बचाने के उपाय

यदि माता-पिता को डायबिटीज है, तो उन्हें अपने बच्चे की डाइट का विशेष ध्यान रखना चाहिए। प्रोसेस्ड फूड और चीनी का सेवन कम करना चाहिए।


स्क्रीन टाइम को कम करना भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि अधिक समय तक स्क्रीन देखने से बच्चे निष्क्रिय रहते हैं।


बच्चों को कम से कम 60 मिनट की शारीरिक गतिविधि के लिए प्रेरित करना चाहिए।


वजन को नियंत्रित करना भी आवश्यक है, क्योंकि मोटापा इंसुलिन रेजिस्टेंस का कारण बन सकता है।


पर्याप्त नींद लेना भी जरूरी है, क्योंकि नींद की कमी से हार्मोन असंतुलित हो सकते हैं।


डायबिटीज के परिवारों को साल में एक बार अपने बच्चे का फास्टिंग ब्लड शुगर या HbA1c टेस्ट कराना चाहिए।