युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर सोशल मीडिया का प्रभाव
सोशल मीडिया और मानसिक स्वास्थ्य
लखनऊ। आज की जीवनशैली और तकनीक के अत्यधिक उपयोग ने युवाओं को एक ऐसे जाल में फंसा दिया है, जो तेजी से उनके मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है। वर्तमान में, सोशल मीडिया पर रील्स और शॉर्ट्स देखने की आदत और बढ़ता अकेलापन युवाओं के लिए एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि इस स्थिति की जड़ 'डोपामाइन लूप' है। जब युवा लगातार रील्स देखते हैं, तो हर 15 सेकंड में मिलने वाला नया कंटेंट उनके दिमाग में खुशी का हार्मोन डोपामाइन का कृत्रिम ओवरडोज़ रिलीज करता है।
इस तात्कालिक संतोष के कारण, युवाओं की एकाग्रता की अवधि में कमी आ गई है। वे गंभीर कार्यों या पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने में असमर्थ महसूस कर रहे हैं, जिससे उनमें चिड़चिड़ापन और धैर्य की कमी हो रही है। इसके अतिरिक्त, सोशल मीडिया की परफेक्ट दुनिया युवाओं में तुलना और हीनता की भावना पैदा कर रही है। वे दूसरों की जीवनशैली और लुक्स देखकर अपनी वास्तविकता से निराश हो रहे हैं। भले ही उनके पास वर्चुअल दुनिया में हजारों फॉलोअर्स हों, लेकिन असल जिंदगी में भावनाएं साझा करने के लिए कोई सच्चा दोस्त नहीं होता, जिससे अकेलापन और बढ़ता है।
रातभर सोशल मीडिया पर स्क्रॉलिंग करने से 'मेलाटोनिन' हार्मोन का निर्माण रुक जाता है, जो नींद के लिए आवश्यक है। इसके परिणामस्वरूप, नींद की कमी और शारीरिक निष्क्रियता गंभीर डिप्रेशन का कारण बन सकती है। इस स्थिति से बाहर निकलने के लिए युवाओं को अपनी दिनचर्या में सुधार करना होगा। उन्हें रोजाना कम से कम 2 घंटे का 'डिजिटल डिटॉक्स' अपनाना चाहिए और स्मार्टफोन में ऐप्स के लिए टाइम लिमिट सेट करनी चाहिए। सोने से एक घंटे पहले फोन को दूर रखें और असली दोस्तों से मिलें, खेलकूद करें या नई हॉबी अपनाएं ताकि उनका मानसिक स्वास्थ्य बेहतर हो सके।