रविवार की छुट्टी: मजदूरों के संघर्ष की कहानी और इसका महत्व
रविवार का महत्व और इसकी उत्पत्ति
जब भी रविवार का नाम लिया जाता है, लोगों के चेहरे पर एक अलग सी खुशी और सुकून नजर आता है। यह दिन परिवार के साथ बिताने, आराम करने और रोजमर्रा की भागदौड़ से थोड़ी राहत पाने का अवसर प्रदान करता है। वर्तमान में भारत में रविवार को साप्ताहिक अवकाश के रूप में मनाया जाता है, लेकिन यह व्यवस्था हमेशा से नहीं थी।
रविवार की छुट्टी का ऐतिहासिक संदर्भ
इस दिन की छुट्टी का इतिहास मजदूरों के संघर्ष और औपनिवेशिक युग से जुड़ा हुआ है। ब्रिटिश शासन के दौरान, भारत में कामकाजी परिस्थितियाँ अत्यंत कठिन थीं, विशेषकर मुंबई की कपड़ा मिलों में काम करने वाले श्रमिकों के लिए। उन्हें लगातार काम करना पड़ता था और छुट्टी का कोई प्रावधान नहीं था। इस निरंतर श्रम और आराम की कमी ने उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाला। ऐसे समय में, समाज सुधारक और श्रमिक नेता नारायण मेघाजी लोखंडे ने श्रमिकों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई।
लोखंडे ने श्रमिकों की समस्याओं को गंभीरता से लिया और उनके लिए साप्ताहिक अवकाश की मांग की। उन्होंने 1881 से 1884 के बीच कई प्रदर्शनों का आयोजन किया और ब्रिटिश प्रशासन को ज्ञापन सौंपे। इस आंदोलन में बड़ी संख्या में श्रमिक शामिल हुए और यह धीरे-धीरे एक मजबूत जनआंदोलन में बदल गया। यह संघर्ष आसान नहीं था और कई वर्षों तक चला। अंततः श्रमिकों की एकता और निरंतर प्रयासों का परिणाम यह हुआ कि ब्रिटिश सरकार ने 10 जून 1890 को रविवार को आधिकारिक साप्ताहिक अवकाश के रूप में मान्यता दी।
रविवार का चयन: धार्मिक और व्यावहारिक कारण
रविवार को छुट्टी के लिए चुनने के पीछे धार्मिक और व्यावहारिक दोनों कारण थे। ब्रिटिश शासक ईसाई धर्म का पालन करते थे, और उनके लिए यह दिन चर्च जाने और प्रार्थना का होता था। इसलिए प्रशासन के लिए इसी दिन अवकाश देना सुविधाजनक था। भारतीय परंपरा में भी रविवार का विशेष महत्व है, क्योंकि इसे सूर्य देव की पूजा के लिए शुभ माना जाता है। इस प्रकार, यह दिन दोनों समुदायों के लिए उपयुक्त साबित हुआ।
रविवार को विश्राम दिवस बनाने की परंपरा केवल भारत तक सीमित नहीं है। इसका इतिहास बहुत पुराना है। 321 ईस्वी में रोमन सम्राट कॉन्स्टेंटाइन द ग्रेट ने पूरे रोमन साम्राज्य में रविवार को आधिकारिक आराम का दिन घोषित किया था। बाद में यह परंपरा यूरोप और ब्रिटेन में अपनाई गई और ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में भी लागू हो गई।
इस प्रकार, आज का रविवार केवल एक छुट्टी नहीं है, बल्कि यह मजदूरों के लंबे संघर्ष, उनके अधिकारों की जीत और ऐतिहासिक बदलाव का प्रतीक है।