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शहरों में दौड़ने का नया ट्रेंड: फिटनेस और दोस्ती का संगम

बड़े शहरों में दौड़ने का नया ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है, जहां लोग जिम की सीमाओं से बाहर निकलकर सामूहिक रूप से दौड़ने का आनंद ले रहे हैं। यह न केवल फिटनेस में सुधार का एक साधन है, बल्कि नए दोस्त बनाने और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने का भी एक तरीका बन गया है। रिपोर्टों के अनुसार, भारत में रनिंग कम्युनिटी के सदस्यों की संख्या 2.6 मिलियन तक पहुंच गई है। जानें कैसे ये क्लब युवाओं को जोड़ रहे हैं और उनके स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव डाल रहे हैं।
 

दौड़ने का बढ़ता चलन

वर्तमान में, बड़े शहरों में रहने वाले लोग जिम की सीमाओं से बाहर निकलकर सड़कों और पार्कों में सामूहिक रूप से दौड़ने का आनंद ले रहे हैं। इस बदलाव का मुख्य कारण केवल फिटनेस में सुधार नहीं है, बल्कि यह नए दोस्त बनाने और अकेलेपन को दूर करने का एक प्रभावी तरीका भी बन गया है। काम के तनाव और मानसिक दबाव से बचने के लिए लोग सुबह जल्दी उठकर एक साथ दौड़ने का निर्णय ले रहे हैं। जब लोग सामूहिक रूप से दौड़ते हैं, तो उनके बीच की दोस्ती और तालमेल गहरा हो जाता है, जिससे यह दौड़ एक सामाजिक गतिविधि में बदल जाती है। 'स्वेट टुगेदर' नामक एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में रनिंग कम्युनिटी के सदस्यों की संख्या अब 2.6 मिलियन तक पहुंच गई है।


रनिंग क्लब्स की बढ़ती संख्या

भारत के प्रमुख शहरों में रनिंग क्लब्स की संख्या तेजी से बढ़ रही है। बेंगलुरु को 'रनिंग कैपिटल' माना जाता है, जहां 150 से अधिक सक्रिय रनिंग ग्रुप्स हैं। दिल्ली और एनसीआर क्षेत्र में भी लगभग 120 बड़े रनिंग क्लब्स मौजूद हैं। इसी तरह, मुंबई में भी 90 से ज्यादा ग्रुप्स सक्रिय हैं।


फिल्टर कॉफी की 'इंडिया फिटनेस इकोसिस्टम' रिपोर्ट के अनुसार, पुणे और हैदराबाद जैसे शहरों में भी पिछले कुछ वर्षों में रनिंग ग्रुप्स की संख्या में 35 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि शहरी लोग अब अकेले वर्कआउट करने के बजाय एक समुदाय के साथ रहना पसंद कर रहे हैं। बड़े आयोजनों की बात करें तो, टाटा मुंबई मैराथन जैसे इवेंट्स में अब 65,000 से अधिक लोग भाग लेते हैं, जबकि 'गीक्स ऑन फीट' के 2026 के आंकड़ों के अनुसार, बेंगलुरु के TCS वर्ल्ड 10K मैराथन में 16,000 से अधिक धावकों ने भाग लिया है।


युवाओं की सेहत पर सकारात्मक प्रभाव

आज की युवा पीढ़ी अपनी सेहत के प्रति अधिक जागरूक हो गई है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों और रिपोर्टों के अनुसार, नियमित रूप से रनिंग क्लब के साथ दौड़ने वाले युवाओं में दिल की बीमारियों का खतरा 30 प्रतिशत तक कम हो जाता है। 'ई-पीक' की रिपोर्ट में बताया गया है कि 44 प्रतिशत धावकों ने कहा है कि दौड़ने से उनकी मानसिक सेहत में सुधार हुआ है, जो एंटी-डिप्रेसेंट दवाओं के समान है। दौड़ने के दौरान शरीर में 'हैप्पी हार्मोन्स' का स्राव होता है, जो दिनभर की थकान को दूर करता है और एकाग्रता को बढ़ाता है। एक सर्वे में यह भी सामने आया है कि रनिंग क्लब में शामिल 70 प्रतिशत लोग मानते हैं कि समूह में दौड़ने से उनका मानसिक तनाव कम हुआ है। साथ ही, 89 प्रतिशत धावकों ने कहा है कि नियमित दौड़ने से वे पहले से अधिक खुश रहते हैं।


क्लब्स में शामिल होने वाले लोग

अधिकतर रनिंग क्लब्स का संचालन उन लोगों द्वारा किया जाता है, जिन्हें दौड़ने का विशेष शौक है। इन क्लब्स को चलाने के लिए अक्सर किसी बड़ी स्पोर्ट्स कंपनी से सहयोग लिया जाता है या सभी सदस्य मिलकर थोड़े पैसे इकट्ठा करते हैं ताकि पानी के स्टॉल और फर्स्ट एड किट जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकें। इन क्लब्स का नेतृत्व अक्सर फिटनेस कोच या पूर्व खिलाड़ी करते हैं। इन क्लब्स में शामिल होने वाले लोगों में 22 से 40 साल के ऑफिस में काम करने वाले लोग सबसे अधिक होते हैं। 'गीक्स ऑन फीट' के 2026 के डेटा के अनुसार, TCS वर्ल्ड 10K बेंगलुरु मैराथन में 25 से 30 साल के युवाओं का समूह सबसे बड़ा था, जो दर्शाता है कि युवा पीढ़ी इसे अपनाने लगी है।


करियर के नए अवसर

रनिंग क्लब अब केवल दौड़ने का स्थान नहीं रह गए हैं, बल्कि ये अनौपचारिक नेटवर्किंग हब भी बन गए हैं। रेड लैब रिपोर्ट के अनुसार, लोग अब शराब और बार के बजाय फिटनेस ग्रुप्स में सामाजिक नेटवर्किंग करना पसंद कर रहे हैं। ऑफिस की मीटिंग्स और माहौल से हटकर यहां होने वाली बातचीत अधिक सीधी और ईमानदार होती है। अब ये क्लब महीने में बड़े इवेंट्स का आयोजन करते हैं, जिसमें 500 से 1,000 लोग एक साथ शामिल होते हैं, जिससे यह प्रक्रिया एक विशाल सामाजिक समुदाय में बदल गई है।